अध्याय ४ योग

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Information about अध्याय ४ योग

Published on July 10, 2016

Author: VibhaChoudhary

Source: slideshare.net

1. 1

2. अध्याय ४

3. ४.१ योग का अर्थ व महत्व ४.२ योग एक भारतीय ववरासत ४.३ योग के अंग ४.४ आसन, प्राणायाम, ध्यान और यौगगक क्रियाओ का पररचय ४.५ आसन और प्राणायाम के शारीररक लाभ ४.६ आम जीवनशैली की बीमाररयों की रोकर्ाम व प्रबंधन : मोटापा, दमा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और पीठ ददथ

4.  योग शब्द संस्कृ त भाषा के शब्द “ यूज ” जजसका अर्थ जोड़ना या ममलाना है , से मलया गया है  योग आत्मा का परमात्मा से ममलन है  योग का अर्थ मनुष्य के शारीररक, मानमसक, बौगधक और आध्याजत्मक अवस्र्ाओं का एकीकरण भी है  योग एक व्यजक्त की चेतना के ववकास का ववज्ञान है

5. १. शारीररक शुद्धता २. रोगो से रोकर्ाम और उपचार ३. मानमसक तनाव कम करता है ४. मोटापा कम करता है ५. तनाव मुक्त करता है ६. शरीर की सही मुद्रा रखता है ७. आध्याजत्मक ववकास ८. लचीलापन बढाता है ९. स्वास््य बेहतर करता है १०.नैततक और सामाजजक मूल्यों का स्तर उठाता है

6. १. शारीररक शुद्धता  हमारे शरीर के आन्तररक अंगों को ववमभन्न यौगगक क्रियाओ से साफ़ क्रकया जा सकता है  आयुवेद के अनुसार, हमारा शरीर वात, वपत्त और कफ से बना है. स्वस्र् रहने के मलए, हमारे शरीर में वात, वपत्त और कफ का संतुलन होना आवश्यक है  नेतत, धोती, वजस्त, त्रतक, नौली, कपालभातत ऐसी यौगगक क्रियाएं है जो हमारे शरीर के आन्तररक अंगों को साफ़ रखते हैं

7. २. रोगो से रोकर्ाम और उपचार  योग कई बीमाररयों का न के वल रोकर्ाम करता है अवपतु उनका उपचार भी करता है  ववमभन्न योगाभ्यास से शरीर की प्रततरक्षण क्षमता बढ़ती है  योगाभ्यास से ब्रोंकाइटटस, साइनुसाइटीस, पीठ ददथ, गटठया, दमा, उच्च रक्तचाप, तनाव, मूत्र ववकार आटद बीमाररयों को रोका व ठीक क्रकया जा सकता है

8. ३. मानमसक तनाव को कम करता है  योग मानमसक तनाव को कम करने में मदद करता है  प्रत्याहार, धारणा और ध्यान महत्वपूणथ भूममका अदा करते है  मकरासन, शवासन, शलभासन, भुजंगासन जैसे आसन तनाव और अवसाद हटाने के मलए लाभकारी है

9. ४. मोटापा कम करता है  मोटापा एक ववश्वव्यापी समस्या बनता जा रहा है  मोटापे से क्रकसी भी व्यजक्त को कई और रोगों के लगने का खतरा बढ़ जाता है  शोध अध्ययनों से पता चला है क्रक मानमसक तनाव और अवसाद मोटापे का कारण हो सकते है  प्राणायाम व यौगगकासन मानमसक तनाव को हटाते है , मोटापे को कम करते है और शरीर को सुंदर व मजबूत है

10. ५. ववश्राजन्त प्रदान करता है  आराम तर्ा ववश्राजन्त र्कान को तनकालने के मलए अतनवायथ हैं।  शोध अध्ययनों से पता चला है क्रक प्राणायाम व यौगगकासन शरीर और मजस्तष्क को ववश्राम देते है  पद्मासन, शवासन, मकरासन ऐसे कु छेक आसन है

11. ६. शरीर की सही मुद्रा रखता है  आधुतनक जीवनशैली के कारण, आजकल आसनीय ववकृ तत बहुत आम हैं जो हमारी कायथदक्षता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है  तनयम से योगासन करने से, व्यजक्त न के वल सही मुद्रा में रहता है अवपतु आसनीय ववकृ ततयों को ठीक भी कर सकता है  वज्रासन, सवाांगासन, मयूरासन, चिासन और भुजंगासन

12. ७. आध्याजत्मक ववकास  मनुष्य योगाभ्यास के द्वारा मन पर तनयंत्रण व आध्याजत्मक ऊँ चाईयों की ओर बढ़ सकता है  पद्मासन, मसद्धासन ध्यान की शजक्त बढ़ाते है  प्राणायाम भी आध्याजत्मक ववकास के मलए उपयोगी है

13. ८. लचीलापन बढाता है  लचीलापन बहुत महत्वपूणथ है क्योंक्रक यह शरीर को कु शलता से चलाने में मदद करता है  योगाभ्यास मांसपेमशयों को अगधक लचीला बनाता है और खेल-कू द सम्बन्धी व अन्य चोटों से बचाता है.  चिासन, धनुरासन, हलासन, भुजंगासन आटद आसन शरीर का लचीलापन बढाने में बहुत लाभकारी है

14. ९. स्वास््य बेहतर करता है  योग न के वल हमारे स्वास््य को कायम रखता है अवपतु उसको सुधारता भी है  मांसपेमशया को सुद्रढ़ बनाता है  शरीर की ववमभन्न प्रणामलया जैसे क्रक श्वसन, रक्त संचार, तंत्रत्रका, मलोत्सगथ संबंधी आटद अगधक कु शल हो जाती है पर समस्त स्वास््य में पररणामी सुधार होता है

15. १०. नैततक और सामाजजक मूल्यों का स्तर उठाता है  योग वतथमान जीवन में इंसान के मलए बहुत महत्वपूणथ है।  अष्टांग योग के पहले दो अंगों ( यम और तनयम ) का अनुसरण करके इन मूल्यों का स्तर उठाया जा सकता है  एक व्यजक्त दैतनक योगाभ्यास से उत्तम स्वास््य पा सकता है और एक संतुष्ट जीवन व्यतीत कर सकता है

16.  प्रमाण टदखाते है क्रक योग का इततहास मसंधु घाटी सभ्यता से संबंगधत है ( ३३००- १३०० ईसा पूवथ )  योग उपतनषदों, महाभारत और रामायण में भी उल्लेखितखत है  महवषथ पतंजमल ने योग सूत्र १४७ ईसा पूवथ के आसपास मलखा

17. यह प्रमाण के सार् कहा जा सकता है क्रक योग का इततहास भारत के इततहास जजतना ही पुराना है योग प्राचीन काल से भारतीय संस्कृ तत का मुख्य अंग रहा है १. पूवथ वैटदक काल २. वैटदक काल ३. उपतनषद् काल ४. महाकाव्य काल ५. सूत्र काल ६. स्मृतत काल ७. मध्ययुगीन काल ८. आधुतनक काल

18. १. पूवथ वैटदक काल ( ३३००- १३०० ईसा पूवथ ) मसन्धु घाटी में मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की खुदाई से ज्ञात हुआ है क्रक उस काल में , क्रकसी न क्रकसी रूप में योग का अभ्यास क्रकया जाता र्ा

19. २. वैटदक काल ( १७५०- ५०० ईसा पूवथ ) योग की कु छ अवधारणाओं को, जो बाद में ववकमसत की गयी र्ी वेदों में पाया जाता हैं. शब्द ‘योग’ व ‘योगी’ का वेदों में उल्लेख नहीं है पर ऋग्वेद में प्रयुक्त ‘युजनते ’ मन पर तनयंत्रण के रूप में योग से सम्बंगधत है

20. ३. उपतनषद काल योग का असली आधार उपतनषद में पाया जाता है. प्राण व नाडी ऐसे महत्वपूणथ ववषय है जजन पर उपतनषदो में चचाथ की गयी है. ववमभन्न योग प्रर्ाओं और उनके शारीररक प्रभाव उपतनषद में उल्लेखितखत हैं।

21. ४. महाकाव्य काल (१००० – ६०० ई. पू.)  रामायण और महाभारत, इस अवगध के दौरान ववमभन्न प्रकार के योग मागो के अभ्यास की जानकारी के महत्वपूणथ स्रोत हैं.  भगवद्गीता योग के तीन मागथ – ज्ञान, भजक्त और कमथ की व्याख्या करती है.

22. ५. सूत्र काल  महवषथ पतंजमल ने 'योग सूत्र' लगभग 147 ईसा पूवथ में कहा र्ा.  योगसूत्र चार भागो में ववभक्त है.  महवषथ पतंजमल ने अष्टांग योग या योग के आठ अंगो को समझाया है.  बौद्ध धमथ और जैन धमथ से संबंगधत ग्रंर्ों से भी ज्ञात होता है क्रक योग लोगों के जीवन का एक मुख्य टहस्सा र्ा।

23. ६. स्मृतत काल  स्मृततयां लगभग १००० ई तक मलखी गयी र्ी.  इस काल में , हम ववचारों, ववश्वासों और पूजा के तौरतरीको में ववमभन्न पररवतथन पाते है.  प्राणायाम और दूसरी शुद्गधकरन प्रक्रियाये कई धाममथक अनुष्ठानों में इस्तेमाल की जाती र्ी।

24. ७. मध्ययुगीन काल इस काल के दो पंर् – नार् पंर् और भजक्त पंर् बहुत प्रमसद्ध हैं. नार् पंर् में हठ योग ववकमसत क्रकया गया और बहुत लोकवप्रय हुआ। इस अवगध के संन्यासी योगाभ्यास करते र्े .

25. ८. आधुतनक काल  स्वामी वववेकानंद, योगानन्द, महवषथ रमण, श्री अरत्रबंदो ने योग को भारत से बाहर फ़ै लाने में बहुत महत्वपूणथ भूममका तनभायी. योगाचायथ बी के एस अयंगर, बाबा रामदेव ने लाखों भारतीयों व ववदेमशयों को योग द्वारा स्वयं को स्वस्र् और तनावमुक्त करने की प्रेरणा दी है

26. ८. आधुतनक काल  न्यूयॉकथ में, संयुक्त राष्र महासभा के ६९वे सत्र में २७- ०९-२०१४ को भारत के प्रधानमंत्री ने ववश्व में शांतत और सद्भाव के मलए 'अंतरराष्रीय योग टदवस' मनाने की जरूरत का प्रस्ताव रखा  संयुक्त राष्र द्वारा 21 जून 'अंतरराष्रीय योग टदवस’ के रूप में घोवषत  प्रर्म 'अंतराथष्रीय योग टदवस‘ 21 जून, 2015 को मनाया गया।

27. यम नियमासि प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्याि समाधयोऽष्टावङ्गानि ॥२९॥

28. १. यम १. अटहंसा: किसी भी जीववत िो िोई िुिसाि ि िरिा. च िंता, ईष्याा, िफरत, क्रोध हहिंसि भाविाऐ हैं। २. सत्य: हम वव ारों, िथि और िामों में सच् ा होिे ाहहए। हमें िपटभरी बातो से दूर रहिा ाहहये ३. अस्तेय: ोरी ि िरिा. दूसरो िी वस्तुओिं, पैसे और वव ारों िो स्वयिं िे लाभ िे ललए उपयोग िरिे िा झुिाव ही ोरी है. इस से दूर रहिा ही अस्तेय है. ४. ब्रहमचयथ : स्वयिं िी ऊजाा सिंरक्षण. स्वयिं िी ऊजाा िा उपयोग आिन्द िे ललए िहीिं अवपतु स्वयिं व समाज िे लाभ िे ललए िरिा। ५. अपररग्रह : अपररग्रह िा अथा गैरअचधिार िी भाविा या अिवािंनित सिंग्रह ि िरिा है ।इसिा अथा जजसिी आवश्यिता िहीिं है उसिा त्याग िरिा है ।

29. २. तनयम १. शौच: शौ िा अथा साफ़-सफाई या पववत्रता है। इसमें आिंतररि व बाह्य सफाई शालमल है । योग िी शुद्चध कक्रया आिंतररि अिंगों िो शुद्ध िरिे में सहायता िरती है। २. संतोष: जीवि में सिंतुजष्ट िा भाव ३. तप: लक्ष्य प्राप्त िरिे िे ललए मुजश्िलों और ववषम पररजस्थनतयों िो सरलता से सहि िरिा ४. स्वाध्याय: स्वाध्याय िा अथा पववत्र ग्रन्थ जैसे गीता, वेद, गुरु ग्रन्थ साहहब , उपनिषद और योगदशाि िा अध्ययि है। स्वाध्याय िा अथा आत्म निरीक्षण भी है । ५. ईश्वर प्रखितणधान: जीवि में सभी घटिाओिं िो ईश्वर िो समवपात िरिा, ईश्वर प्रणणधाि है । हमें अहिंिार , अलभमाि और मि िे अन्य दोषों िा उन्मूलि व ईश्वर िे प्रनत समपाण िरिा ाहहए ।

30. ३. आसन आसन शरीर की ववमभन्न मुद्राये है। ये शरीर की हर मांसपेशी , तंत्रत्रका और ग्रंगर्यों को व्यायाम कराने के मलए सटदयों से ववकमसत की गयी है।

31. योग के अंग: ४. प्राणायाम श्वसन प्रणाली पर तनयंत्रण प्राणायाम है. इसका अर्थ साँस लेने व तनकलने पर उपयुक्त तनयंत्रण करना है. यह चयापचय गततववगध को ववतनयममत करने में मदद करता है और टदल और फे फड़ों के प्रकायथ को बढ़ाता है. यह दीघाथयु भी प्रदान करता है।

32. योग के अंग: ५. प्रत्याहार योगी इजन्द्रयों को अपने तनयंत्रण में लाने का प्रयास करता है। ऐसा करके वह अपने अवगुणों को नष्ट करने में और टदव्य गुणों को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त करता है।

33. योग के अंग: ६. धारणा धारणा एक त्रबंदु या वस्तु पर ध्यान कें टद्रत करने का प्रयास है। यह सम्पूणथ एकाग्रता की जस्र्तत है। यह गुण प्राप्त करने में वषों लग जाते है क्योंक्रक मन को तनयंत्रत्रत करना बहुत कटठन है ।

34. ७. ध्यान  ध्यान सवथव्यापी ईश्वर में एकाग्रता जजससे स्वयं को इश्वरत्व में बदला जा सके से संदमभथत है ।  यह मन के शान्त होने की जस्र्तत है ।

35. ८. समागध व्यजक्त की आत्मा का परमात्मा के सार् ममलन को समागध कहा जाता है। इस जस्तगर् में गचत्त की वृवत्तयों पुणथतः रुक जाती है. दैववक आनंद का अनुभव.

36. जस्थरसुखमासिम ् ॥४६॥( पातन्जलल योगसूत्र ) आसन वो मुद्रा है जो जस्र्र और सुखदायक है ये शरीर की हर मासपेशी, तंत्रत्रका और ग्रंगर्यों को व्यायाम कराने के मलए सटदयों से ववकमसत की गयी है।

37. आसनो का वगीकरण ध्यान मुद्रायें आरामदेह मुद्रायें दोषतनवारक मुद्रायें ध्यान लगाने की शजक्त बढती है र्कान हटाते है और शारीररक व मानमसक तनावमुक्त करते है शरीर की ववमभन्न गततववगधयों व प्रणामलयों को तनयममत करते है पद्मासन मसद्धासन गौमुखासन वीरासन शवासन मकरासन शशांकासन शीषाथसन सवांगासना मत्यासन हलासन भुजंगासन चिासन

38. ध्यान मुद्रायें आरामदेह मुद्रायें दोषतनवारक मुद्रायें पद्मासन शशांकासन शीषाथसन

39. प्राणायाम श्वास तनयंत्रण का ववज्ञान है। शब्द “प्राणायाम” दो भागो से बना है प्राण और आयाम । प्राण का अर्थ जीवन प्रदान करने वाला श्वांस है आयाम का अर्थ ववस्तार या संयममत करना है । ववलोम , अनुलोम और प्रततलोम साँस के लेने और छोड़ने के तरीको से सम्बंगधत है ।

40. पूरक रेचक कु म्भक साँस लेना साँस छोड़ना साँस लेने या छोड़ने के बाद अवधारणा आंतररक साँस फे फड़ो में लेने के बाद रोकना बाह्य फे फड़ो से हवा बाहर तनकालने के बाद साँस रोकना

41.  सूयथभेदी प्राणायाम  उज्जयी प्राणायाम  शीतकारी प्राणायाम  शीतली प्राणायाम  भजस्त्रका प्राणायाम  प्लाववनी प्राणायाम  मूछाथ प्राणायाम

42. ध्यान का अर्थ ध्यान मन की संपूणथ एकाग्रता की एक प्रक्रिया है. महवषथ पतंजमल के अनुसार ध्यान का अर्थ एक त्रबन्दु पर लगातार एकाग्रता है । ध्यान कोई अभ्यास नहीं बजल्क मन की एक जस्तगर् है

43. ध्यान की पररभाषा एक ववचार पर तनबाथध एकाग्रता ध्यान है --- पतंजमल क्रकसी वस्तु पर मन कें टद्रत करना ध्यान है। अगर मन एक वस्तु पर कें टद्रत हो सकता है तो यह क्रकसी भी वस्तु पर कें टद्रत कर सकता है --- स्वामी वववेकानंद

44. ध्यान के लाभ यह मन को शांत करता है । यह एकाग्रता की शजक्त ववकमसत करता है । यह मन को अशांत करने से रोकने की मानमसक शजक्त देता है । यह आत्म ज्ञान की तरफ ले जाता है । यह आपसी ववश्वास और समझ की नींव रखने की ओर अग्रसर करता है। यह स्वयं के कल्याण – शारीररक , मानमसक और अध्याजत्मक की बहाली की ओर अग्रसर करता है ।

45. 1. आसि शरीर िी सभी प्रणाललयों पर िाम िरते है 2. ये रीड िी हड्डी और जोड़ों िो ल ीला बिाते है । 3. ये मााँशपेलशयो , ग्रिंचथयों और आिंतररि अिंगों िो सुद्र्ढ िरते है 4. ये मााँशपेलशयो िा ल ीलापि बढ़ाते है । 5. ये पुरािी बबमाररयों िो ठीि िरिे में मदद िरतें हैं। 6. ये शरीर िी प्रनतरक्षा क्षमता और उजाा स्तर में वृचध िरतें हैं । 7. ये वजि िो सामान्य और िीिंद िो बेहतर िरतें हैं।

46. 8. ये रक्त ाप और िाडी दर िो भी िम िरते हैं । 9. योगासि िे अभ्यास से फे फड़ों िी सिंिु ि और ववस्तार िी क्षमता बढती है और इसिे पररणाम से रक्त िी शुद्चध होती है । 10. ये हड्डीयों िे घित्व िो बढ़ािे में मद्द िरतें हैं। 11. योगासि िा अभ्यास प्रनतरक्षा प्रणाली िो भी अचधि प्रभावी बिा देता है ।

47. प्राणायाम िा अभ्यास स्वास््य िो बिाये रखिे में और जीवि में प्रगनत िे ललये बहुत उपयोगी है. इसिे शारीररि लाभ निम्ि है : 1. यह तिंबत्रिा तन्त्र िो आराम और पूरी शरीर प्रणाली िो मजबूत बिाता है । 2. यह अिंत: स्रावी प्रणाली में सामिंजस्य लाता है । 3. यह ताित और शजक्त िो बढाता है । 4. यह ऑक्सीजि िी खपत िो िम िरता है । 5. यह मााँशपेलशयो में तिाव िम िरता है । 6. यह सााँस िी दर िो घटा िर सामान्य बिाता है ।

48. 7. यह िसरत िरिे िी सहहष्णुता बढाता है । 8. यह फे फड़ों में हवा िे प्रवाह में सुधार और सााँस आसािी से लेिे में मदद िरता है । 9. यह हमारे फे फड़ों िो मजबूत िरता है । 10.यह हमारे शरीर से अपलशष्ट उत्पादों िो हटािे में सुधार लाता है । 11.यह गहठया और एलजी जैसी पुरािी बीमाररयों िे ईलाज में मदद िरता है । 12.यह उच् व निम्ि रक्त ाप से पीड़ड़त व्यजक्तयों िो लाभ देता है ।

49. षटकमथ आसन और प्राणायाम के अततररक्त, योग में , शरीर के आंतररक अंगों व प्रणामलयों के शुद्गधकरण के मलए कई और पद्धततया प्रयुक्त की जाती है। नेतत, धौती, नौली, वजस्त, त्रतक, कपालभातत मुख्य छः यौगगक क्रियाँए हैं इन्हें षटकमथ भी कहा जाता है

50. नेतत नेती क्रिया को मुख्यत: श्वसन संस्र्ान के अवयवों की सफाई के मलए प्रयुक्त क्रकया जाता है। इसे करने से प्राणायाम करने में भी आसानी होती है। इसे तीन तरह से क्रकया जाता है:- १. सूत नेती २. जल नेती ३. कपाल नेती। सूत नेती जलनेती

51. नेतत १.सूत नेती : एि मोटा लेकिि िोमल धागा जजसिी लिंबाई बारह इिं हो और जो िालसिा निद्र में आसािी से जा सिे लीजजए। इसे गुिगुिे पािी में लभगो लें । एि िोर िालसिा निद्र में डालिर मुाँह से बाहर नििालें। कफर मुाँह और िाि िे डोरे िो पिड़िर धीरे-धीरे दो या ार बार ऊपर-िी े खीिं िा ाहहए। इसी प्रिार दूसरे िाि िे िेद से िरे। २.जल नेती : जल एि बताि से एि िथुिा में डाला जाता है जो दुसरे िथुिा से जो कि पहले िथुिा से िी ा है से धीरे-धीरे बाहर नििल आता है। ३.कपाल नेती : मुाँह से पािी पी िर धीरे-धीरे िाि से नििालें। सावधानी : सूत िो िाि में डालिे से पहले गरम पािी में उबाल लें जजससे किसी प्रिार िे जीवाणु िहीिं रहते। प्रारम्भ में िेती कक्रया योगा ाया िे मागादशाि में िरें। इसे िरिे िे बाद िपालभाती िर लेिा ाहहए। लाभ : इस कक्रया िे अभ्यास से िालसिा मागा िी सफाई होती ही है साथ ही िाि, िाि, दााँत, गले आहद िे िोई रोग िहीिं हो पाते और आाँख िी दृजष्ट भी तेज होती है। सदी, जुिाम और खााँसी िी लशिायत िहीिं रहती।

52. धौती धौतत क्रिया को मुख्यत: वपत्त दोष तनवारण के मलए करते है। इसके ववमभन्न प्रकार तनम्नमलखितखत है १. वमन धौती २. बह्नीसार धौती ३. वातसार धौती ४. वस्त्र धौती धौती क्रिया बार बार जुकाम होना, टांमसल ,पेट में गैस, एमसडडटी, र्ाइरॉयड, गले की एलजी, श्वास सम्बन्धी समस्या आटद को दूर करती है। वस्त्र धौती

53. धौती वमन धौती : पााँ ि: ग्लास गुिगुिा पािी पी लें। इसिे बाद दोिों हाथों िो जााँघ पर रखिर थोड़ा आगे िी ओर झुि िर खड़े हो जाइए।उड्डीयाि बिंध लगािर िौली कक्रया िरें। वपया हुआ जल िो वमि िे माध्यम से पूरा बाहर नििाल दें। वस्त्र धौती: इस कक्रया में, मलमल िपडे िी 4” ौडी और 22 फीट लम्बी पट्टी मुाँह िे द्वारा पेट में ले जािर कफर उड्डीयाि बिंध लगािर िौली कक्रया िरें। इसिे पश् ात धीरे-धीरे सावधािी पूवाि पट्टी बाहर नििाले। सावधातनयां: इस कक्रया में िपड़े िो निगलिा िहठि होता है। इसललए इस कक्रया िो धीरे-धीरे िरें।िपड़ा निगलते समय सावधािी रखें, क्योंकि नििालते समय िभी-िभी िपड़ा अटि जाता है, परन्तु घबराएिं िहीिं िपड़े िो पुि: अन्दर निगलें और कफर बाहर नििालें।

54. वजस्त गुदा िे शोधि िी कक्रया िो वजस्त कक्रया िहते है। आधुनिि एनिमा ही ऋवषयों िी प्रा ीि वजस्त कक्रया है। घेरण्ड सहहता में शुष्ि वजस्त व जल वजस्त िा वणाि है। इस कक्रया में, बड़ी आिंत िो साफ़ िरिे िे ललए, मलद्वार से जल या हवा अन्दर खीिं िे िी िोलशश िी जाती है। लाभ: १. वात, वपत, िफ इि तीिो िा नियिंत्रण | २. पा ि कक्रया में वृद्चध | ३. शारीररि पीड़ा िहीिं होगी | ४. िोई रोग िहीिं होगा |

55. नौली यह पेट िे ललए महत्वपूणा व्यायाम है। इससे भूख बढ़ती है। यिृ त, नतल्ली और पेट से सिंबिंचधत अिेि बीमाररयों से मुजक्त लमलती है। १. उड्डडयान बंध : मुाँह से बल पूवाि हवा नििालिर िाभी िो अिंदर खी ें यह उड्डीयािबिंध है। २. वामननौली : जब उड्ड़डयािबिंध पूरी तरह लग जाय तो मााँसपेलशयों िो पेट िे बी में िोड़े। पेट िी मााँसपेलशयााँ एि लम्बी िली िी तरह हदखाई पड़ेगी। इन्हें बाएाँ ले जाएाँ। ३. दक्षक्षण नौली : इसिे पश् ात इसे दाहहिी ओर ले जाएाँ। ४. मध्यमा नौली : इसे मध्य में रखें और तेजी से दाहहिे से बाएाँ और बाएाँ से दाहहिी ओर ले जािर मााँसपेलशयों िा मिंथि िरें।

56. नौली िौलल पेट िी मािंसपेलशयों िो मजबूत िरती है और आिंतों व पेट िे नि ले अवयवों िी माललश िरती है। यह रक्त ाप िो नियलमत िरती है और मधुमेह िे णखलाफ सुरक्षात्मि परहेजी प्रभाव रखती है। यह अम्ल शूल और मा रोगों (मुहािंसों) िो दूर िरिे में सहायि है। मध्यमा नौली

57. कपालभातत इसके मलए पालर्ी लगाकर सीधे बैठें, आंखें बंदकर हार्ों को ज्ञान मुद्रा में रख लें। सांस धीरे धीरे अन्दर लें और क्षण भर के मलये सांस रोक कर, इसे तेज़ी और बलपूवथक बाहर लें। यह प्रक्रिया बार-बार इसी प्रकार तब तक करते जाएं जब तक र्कान न लगे। क्रफर पूरी सांस बाहर तनकाल दें और सांस को सामान्य करके आराम से बैठ जाएं। कपालभातत साँस तेजी और बलपूवथक बाहर तनकाले साँस धीरे धीरे अन्दर लें ज्ञान मुद्रा

58. कपालभातत सावधानी : यह अभ्यास सुबह खाली पेट शौ ाहद िे बाद खुले वातावरण में िरें। हाई बीपी, हृदय रोग में इसिा अभ्यास योगा ाया िे मागादशाि में िरें। हनिाया, अल्सर व पेट िा ऑपरेशि हुआ हो तो इसिा अभ्यास ि िरें। लाभ : - इससे मोटापा, डायबटीज, िब्ज़, गैस, भूख िा लगिा और अप जैसे पेट िे रोग ठीि होते हैं। - बाल झड़िे से ब ाता है। - हृदय, फे फड़े, थायरॉयड व मजस्तष्ि िो बल लमलता है। - खूि में ऑक्सीजि िी मात्रा बढ़िर रक्त शुद्ध होिे लगता है। - महहलाओिं में मालसि धमा िी अनियलमतता िो ठीि िर गभााशय व ओवरी िो बल लमलता है। - हामोंस सिंतुललत रहते हैं। - शरीर िा व़ि सिंतुललत रखिे में भी मदद िरती है।

59. त्राटक जजतनी देर तक आप त्रबना पलक गगराए क्रकसी एक त्रबंदु, क्रिस्टल बॉल, मोमबत्ती या घी के दीपक की ज्योतत पर देख सकें देखते रटहए। इसके बाद आँखें बंद कर लें। कु छ समय तक इसका अभ्यास करें। इससे आप की एकाग्रता बढ़ेगी।

60. त्राटक सावधानी : १. त्राटि िे अभ्यास से आाँखों और मजस्तष्ि में गरमी बढ़ती है, इसललए इस िे तुरिंत बाद िेती कक्रया िरिी ाहहए। २. आाँखों में किसी भी प्रिार िी तिलीफ हो तो यह कक्रया िा िरें। ३. अचधि देर ति एि-सा िरिे पर आाँखों से आाँसू नििलिे लगते हैं। ऐसा जब हो, तब आाँखें झपिािर अभ्यास िोड़ दें। लाभ : १. आाँखों िे ललए तो त्राटि लाभदायि है ही साथ ही यह एिाग्रता िो बढ़ाता है। २. इसिा नियलमत अभ्यास िर मािलसि शािंनत और निलभािता बढ़ती है। ३. इससे आाँख िे सभी रोग िू ट जाते हैं। ४. मि िा वव लि खत्म हो जाता है।

61. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन योगाभ्यास से जीवि शैली िी बहुत सी बीमाररयों िी रोिथाम और प्रबिंधि में मदद हो सिती है । िु ि रोग या समस्याएाँ जजििा योग से रोिथाम और प्रबिंधि किया जा सिता है निम्िललणखत हैं :  मोटापा  मधुमेह  उच् रक्त ाप  पीठ ददा  दमा

62. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  मोटापा : मोटापा स्वयिं में िोई बीमारी िहीिं है लेकिि मधुमेह और हदल िी बीमाररयों जैसी िई गिंभीर बीमाररयों िा एि प्रमुख िारण है ।  इि बीमाररयों िे िई िारण है लेकिि इस तरह िी समस्याएाँ, ज्यादातर आिंतररि अिंगों िे आस पास वसा िे जमाव िे िारण होती है ।  इस आिंतररि वसा िा जमाव जो कि वसा िा सिं य िहा जाता है , नियलमत व्यायाम और योग िे माध्यम से रोिा जा सिता है ।

63. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  मोटापा : मोटापा पता करने की ववमभन्न सामान्य ववगधयाँ  देख िर  शरीर िा वजि ऊाँ ाई िे अिुपात से अचधि (ऊाँ ाई व वजि ाटा िे अिुसार ).  शरीर वसा % िी गणिा िी जाती है. यहद शरीर वसा % जरुरत से ज्यादा है तो व्यजक्त िो मोटा मािा जाता है  इि तीि ववचधयों में से, ऊाँ ाई व वजि ाटा आसािी से उपलब्जध होिे िे िारण, अचधि पसिंद किया जाता है

64. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  मोटापा :  योगासि जो मोटापे िो रोििे िे ललए अिुशिंलसत है : १. अधाहलासि २. द्वव क्रीिासि ३. धिुरासि ४. भुजिंगासि ५. अधािौिासि ६. उत्तािासि ७. मयूरासि धनुरासनमयूरासन

65. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  मधुमेह : यह रोग रक्त में ग्लाइिोजि या ग्लूिोज िी सामान्य सीमा से अचधि िी उपजस्तथी िा सिंिे त देता है ।  रक्त में ग्लूिोज िा स्तर , रक्त शिा रा स्तर भी िहा जाता है ।  सामान्य रक्त शिा रा िा स्तर 80 mgm/100 cc (उपवास) से 120 mgm/100 cc (भोजिोपरान्त ) ति बदलता है क्योंकि ीिी िी बड़ी मात्रा रक्त प्रवाह में लगातार प्रवेश िर रही है और वहािं से हटायी भी जा रही है ।

66. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  मधुमेह :  हमारा जजगर और अन्तःस्त्रावी ग्रजन्थयािं, रक्तशिा रा स्तर िे नियमि में एि महत्वपूणा भूलमिा निभाते हैं ।  अग्न्याशय हमारे शरीर में शिा रा िे स्तर िो नियिंबत्रत िरिे में एि महत्वपूणा भूलमिा निभाता है।  यह इन्सुललि स्राववत िरता जो हमारे शरीर में शिा रा िो जलािे में मदद िरता है।  इस ग्रिंचथ िे द्वारा इन्सुललि स्राव िी िमी , मधुमेह िा मुख्य िारण है।  मधुमेह हदल िा दौरा , गुदे िी ववफलता , दृजष्ट िी हानि और तिंबत्रिा क्षनत िर सिता है।

67. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  मधुमेह : सामान्य लक्षण: 1. हर समय थिाि िी भाविा 2. बार-बार पेशाब िरिे िी जरूरत 3. हाथ और पैर में सिंवेदि शुन्यता होिा 4. दृजष्ट िा धुिंधलापि 5. अत्यचधि वजि बढ़िा या वजि घटिा 6. घाव िा ठीि ि होिा मधुमेह प्रकार-१ मधुमेह प्रकार-२ अग्न्याशय द्वारा इन्शुललि ि बिािा इिंसुललि िी पयााप्त मात्रा िा उत्पादि ि होिा दुलाभ प्रिार िा मधुमेह उत्पाहदत इिंसुललि िा शरीर में ठीि से उपयोग ि होिा दैनिि इिंसुललि इिंजेक्शि उप ार िे ललए आवश्यि है साधारण मधुमेह

68. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  मधुमेह : िु ि यौचगि आसि जजि िा अग्न्याशय पर ववशेष प्रभाव पड़ता है जजस से मधुमेह िे इलाज में मदद लमलती है, निम्िललणखत हैं:  शलभासि  धिुरासि  भुजिंगासि  सवाांगासि  मयूरासि  शीषाासि शीषाथसनसवाांगासन

69. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  उच्च रक्तचाप : अनियिंबत्रत उच् रक्त ाप हदल िी बीमाररयों िा जोणखम बढाता है।  उच् रक्त ाप, मुख्य रूप से आधुनिि समय िी तेज और व्यस्त जीवि शैली िे िारण होता है।  इसे आम तौर से, व्यजक्त िे िोलेस्रोल स्तर िे साथ जोड़ा जाता है।  धूम्रपाि, मधुमेह और मोटापा भी उच् रक्त ाप िे साथ जुड़े है।

70. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  उच्च रक्तचाप :  योगासि उच् रक्त ाप िो नियिंबत्रत िरिे में बहुत उपयोगी है।  उच् रक्त ाप िो नियिंबत्रत िरिे िे ललये निम्ि आसि अिुशिंलसत है: १. पद्मासि २. हलासि 3. शवासि 4. पश् ीमोतािासि 5. लसद्धासि 6. वीरासि शवासन हलासन

71. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  पीठ ददथ :  पीठ ददा आधुनिि जीविशैली िा दुष्पररणाम है।  यह मुख्य रूप से , आसीि जीवि, टीवी, ििं प्यूटर, i-pad आहद िे सामिे लम्बे समय बैठिे िे िारण होता है।  लम्बे समय ति िार और स्िू टर लािे िा पररणाम भी पीठ ददा हो सिता है।  पीठ ददा अक्सर गलत मुद्रा में बैठिे िी आदत िे िारण भी हो सिता है।  पीठ ददा, िु ि शारीररि जहटलताओिं िा पररणाम भी हो सिता है।

72. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  पीठ ददथ :  पीठ ददा िे रोिथाम और प्रबिंधि िे ललए निम्िललणखत योगासि अिुशिंलसत है: १. भुजिंगासि २. शलभासि ३. ववपरीत िौिासि ४. धिुरासि ५. मिरासि ६. क्रासि ७. सेतुबिंधासाि शलभासन चिासन

73. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  दमा :  दमा हवा िो फे फडो में लािे और लौटािे वाले वायुमागा िो सिंक्रलमत िरिे वाली बीमारी है।  दमा से पीड़ड़त , आमतौर पर घरघराहट, सीिे में जिड़ि, सािंस लेिे में िहठिाई, खािंसी और वायुमागा िी सुजि जैसे लक्षण अिुभव िरते है।  दमा िो रोििे िे ललए, दमा िे हमले िे निम्िललणखत िारिो से ब िा ाहहये: १. धूम्रपाि / निजष्क्रय धूम्रपाि व प्रदूवषत हवा। २. एलजी िरिे वाले पशु जजसमे पालतू पशु भी शालमल है से अरक्षक्षतता। ३. िालीि और घर में रहिे वाली धूल से अरक्षक्षतता।

74. आम जीवन शैली की बीमाररयों की रोकर्ाम और प्रबंधन  दमा :  इस रोग में गोमुखासन और सूयथभेदी प्राणायाम अत्यन्त लाभदायक है। गोमुखासन

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