साधन पाद

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Spiritual

Published on February 19, 2009

Author: Sanjayakumar

Source: slideshare.net

पातञ्जल योगदर्शनम् अथ द्वितीयः साधनपादः *** प्रस्तुत कर्ता - संजय कुमार

अथ द्वितीयः साधनपादः

***

प्रस्तुत कर्ता -

संजय कुमार

साधनपाद में प्रतिपाद्य विषय (1) प्रतिपाद्य विषय सूत्र संख्या क्रियायोग और उसका फल अविद्या आदि पाँच क्लेश क्लेश और क्लेश वृत्तियों के नाश का उपाय क्लेशमूल कर्माशय और उनके फल विवेकी के लिये दुःख और उनकी हेयता दु : ख का हेतु द्रष्टा और दृश्य का संयोग दृश्य का स्वरूप और उसके भेद द्रष्टा का स्वरूप और उसीके लिये दृश्य का उभरना दृश्य कब और किसके लिये उभरता और ओझल होता है। द्रष्टा - दृश्य के संयोग का स्वरूप , उसका हेतु , हेतु का हान और हान का उपाय - विवेकख्याति 1-2 3-9 10-11 12-14 15-16 17 18-19 20-21 22 23-26

क्रियायोग और उसका फल

अविद्या आदि पाँच क्लेश

क्लेश और क्लेश वृत्तियों के नाश का उपाय

क्लेशमूल कर्माशय और उनके फल

विवेकी के लिये दुःख और उनकी हेयता

दु : ख का हेतु द्रष्टा और दृश्य का संयोग

दृश्य का स्वरूप और उसके भेद

द्रष्टा का स्वरूप और उसीके लिये दृश्य का उभरना

दृश्य कब और किसके लिये उभरता और ओझल होता है।

द्रष्टा - दृश्य के संयोग का स्वरूप , उसका हेतु , हेतु का हान और हान का उपाय - विवेकख्याति

1-2

3-9

10-11

12-14

15-16

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18-19

20-21

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23-26

साधनपाद में प्रतिपाद्य विषय (2) प्रतिपाद्य विषय सूत्र संख्या सात प्रकार की प्रांतभूमि प्रज्ञा योगांगों के अनुष्ठान का फल और योग के आठ अंगों का महत्त्वनिर्देशपूर्वक नामोल्लेख । वितर्क और उनके रोकने की विधि यम और नियम नामक योगांगों के अनुष्ठान तथा उसकी पूर्णता पर प्रात होनेवाले फल । योगांग आसन का लक्षण , उसकी सिद्धि और फल । प्राणायाम का लक्षण , उसके भेद और फल । प्रत्याहार योगांग का लक्षण और उसकी सिद्धि से प्राप्त होने वाला फल । 27 28-32 33-34 35-45 46 -48 49-53 54-55

सात प्रकार की प्रांतभूमि प्रज्ञा

योगांगों के अनुष्ठान का फल और योग के आठ अंगों का महत्त्वनिर्देशपूर्वक नामोल्लेख ।

वितर्क और उनके रोकने की विधि

यम और नियम नामक योगांगों के अनुष्ठान तथा उसकी पूर्णता पर प्रात होनेवाले फल ।

योगांग आसन का लक्षण , उसकी सिद्धि और फल ।

प्राणायाम का लक्षण , उसके भेद और फल ।

प्रत्याहार योगांग का लक्षण और उसकी सिद्धि से प्राप्त होने वाला फल ।

27

28-32

33-34

35-45

46 -48

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साधनपाद प्रथम पाद में समाधि का स्वरूप , उसके भेद , अवांतर भेद , के अंतरंग साधन - वैराग्य तथा समाधि के फल आदि का विवरण प्रस्तुत किया गया। * योग के अंतरंग साधनों का अनुष्ठान वे उत्तम अधिकारी कर पाते हैं , जिनका चित्त पहले से शुद्ध होता है , वैराग्य की भावना रहती है , तथा समाधिप्राप्ति के मार्ग पर चलने के लिये रुचि एवं आकर्षण होता है। * ऐसे समाहित चित्तवाले व्यक्तियों का अंतरंग साधनों के अनुष्ठान में सीधे प्रवृत्ति होना सम्भव रहता है। * जो अभी विक्षिप्तचित्त है , ऐसे मध्यम अधिकारियों के लिये आवश्यक है कि वे प्रथम बहिरंग साधनों का अनुष्ठान कर चित्त को शुद्ध बनायें।

प्रथम पाद में समाधि का स्वरूप , उसके भेद , अवांतर भेद ,

के अंतरंग साधन - वैराग्य तथा समाधि के फल आदि

का विवरण प्रस्तुत किया गया।

*

योग के अंतरंग साधनों का अनुष्ठान वे उत्तम अधिकारी कर पाते हैं ,

जिनका चित्त पहले से शुद्ध होता है , वैराग्य की भावना रहती है , तथा

समाधिप्राप्ति के मार्ग पर चलने के लिये रुचि एवं आकर्षण होता है।

*

ऐसे समाहित चित्तवाले व्यक्तियों का अंतरंग साधनों के अनुष्ठान में

सीधे प्रवृत्ति होना सम्भव रहता है।

*

जो अभी विक्षिप्तचित्त है ,

ऐसे मध्यम अधिकारियों के लिये आवश्यक है कि

वे प्रथम बहिरंग साधनों का अनुष्ठान कर चित्त को शुद्ध बनायें।

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ 2/1 ॥ [52] तप , स्वाध्याय , ईश्वर - प्रणिधान ; यह सब क्रियायोग नामक बहिरंग साधन है , जो चित्त को शुद्ध - निर्मल करने में सहयोगी होता है। बहिरंग साधनों में से अन्यतम साधन क्रियायोग का निर्देश सूत्रकार ने यहाँ किया है - जैसा कि आगे [2/29] बताया गया है , योग के आठ अंग हैं - यम , नियम , आसन , प्राणायाम ,, धारणा ,, ध्यान और समाधि - इनमें यम - नियम का प्रथम स्थान पर निर्देश किया गया है। यम - ये पाँच हैं - अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । नियम - ये भी पाँच हैं - शौच , संतोष , तप , स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान - । यम सामाजिक आचरण की व्यवस्था है , और नियम वैयक्तिक आचरण के लिये हैं। मानव धर्मशास्त्र में यमों के आचरण को महत्त्व दिया गया है , इससे सामाजिक व्यवस्था में विशृंखलता उत्पन्न नहीं होती। इस रूप में यमों का सेवन कठिन तथा नियमों का सेवन कुछ सरल व निरपेक्ष होता है । प्रस्तुत सूत्र में उपदिष्ट - तप , स्वाध्याय , ईश्वरप्रणिधान -- नियमों का पर भाग है। क्रियायोग नाम से आचार्य ने बहिरंग साधनों में इनका निर्देश इसी भावना से किया प्रतीत होता है कि योगमार्ग के साधक को अपना अनुष्ठान इन्हीं से प्रारम्भ करना चाहिये । यह साधन शरीर वाणी व मन से नियमपूर्वक आचरण किये जाने की अपेक्षा रखता है। इनके पूर्ण आचरण से योग के लिये चित्तभूमि दृढ़ व शुद्ध हो जाती है।

बहिरंग साधनों में से अन्यतम साधन क्रियायोग का निर्देश सूत्रकार ने यहाँ किया है -

जैसा कि आगे [2/29] बताया गया है , योग के आठ अंग हैं -

यम , नियम , आसन , प्राणायाम ,, धारणा ,, ध्यान और समाधि -

इनमें यम - नियम का प्रथम स्थान पर निर्देश किया गया है।

यम - ये पाँच हैं - अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ।

नियम - ये भी पाँच हैं - शौच , संतोष , तप , स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान - ।

यम सामाजिक आचरण की व्यवस्था है , और नियम वैयक्तिक आचरण के लिये हैं। मानव धर्मशास्त्र में यमों के आचरण को महत्त्व दिया गया है , इससे सामाजिक व्यवस्था में विशृंखलता उत्पन्न नहीं होती।

इस रूप में यमों का सेवन कठिन तथा नियमों का सेवन कुछ सरल व निरपेक्ष होता है ।

प्रस्तुत सूत्र में उपदिष्ट - तप , स्वाध्याय , ईश्वरप्रणिधान -- नियमों का पर भाग है।

क्रियायोग नाम से आचार्य ने बहिरंग साधनों में इनका निर्देश इसी भावना से किया प्रतीत होता है कि योगमार्ग के साधक को अपना अनुष्ठान इन्हीं से प्रारम्भ करना चाहिये ।

यह साधन शरीर वाणी व मन से नियमपूर्वक आचरण किये जाने की अपेक्षा रखता है।

इनके पूर्ण आचरण से योग के लिये चित्तभूमि दृढ़ व शुद्ध हो जाती है।

तप शीत - उष्ण , सुख - दुःख , हानि - लाभ आदि द्वन्द्वों का सहना । आत्मा अनादि काल से कर्म करता चला आरहा है। उसके कारण विविध प्रकार के क्लेश और वासनाओं से चित्त ओतप्रोत रहता है , विषयों के जंजाल में आत्मा को आकृष्ट करता रहता है : चित्त की अशुद्धि का यही स्वरूप है। क्लेश और वासनाओं की यह सघन राशि तपःप्रभाव से छीदी या पतली हो पाती है। हानि - लाभ , सुख - दु : ख , गर्मी - सर्दी , भूख - प्यास , मान - अपमान आदि विरोधी द्वन्द्वों को , बिना किसी चिंता व शोक के सहन करते रहने से वासना और क्लेश क्षीण होने लगते हैं। यह ध्यान रखना चाहिये कि द्वन्द्वों का सहन करना , अपनी शारीरिक अवस्था के अनुसार , उचित मात्रा से अधिक न हो ; अन्यथा शरीर में धातुवैषम्य उत्पन्न होकर साधक को रोगी बना देता है। इससे योगानुष्ठान में अनायास बाधा उपस्थित होजाती है। तप का आचरण शरीर , वाणी और मन - तीनों से होना चाहिये । यह भी ध्यान रखना चाहिये कि वह तप सात्त्विक रूप हो ; राजस - तामस न हो । योगमार्ग की सफलता के लिये सात्विक तप ही उपयोगी होता है । जो व्यक्ति तपस्वी नहीं है , वह योगमार्ग में सफल नहीं हो सकता।

आत्मा अनादि काल से कर्म करता चला आरहा है। उसके कारण विविध प्रकार के क्लेश और वासनाओं से चित्त ओतप्रोत रहता है , विषयों के जंजाल में आत्मा को आकृष्ट करता रहता है : चित्त की अशुद्धि का यही स्वरूप है।

क्लेश और वासनाओं की यह सघन राशि तपःप्रभाव से छीदी या पतली हो पाती है।

हानि - लाभ , सुख - दु : ख , गर्मी - सर्दी , भूख - प्यास , मान - अपमान आदि विरोधी द्वन्द्वों को , बिना किसी चिंता व शोक के सहन करते रहने से वासना और क्लेश क्षीण होने लगते हैं।

यह ध्यान रखना चाहिये कि द्वन्द्वों का सहन करना , अपनी शारीरिक अवस्था के अनुसार , उचित मात्रा से अधिक न हो ; अन्यथा शरीर में धातुवैषम्य उत्पन्न होकर साधक को रोगी बना देता है। इससे योगानुष्ठान में अनायास बाधा उपस्थित होजाती है।

तप का आचरण शरीर , वाणी और मन - तीनों से होना चाहिये ।

यह भी ध्यान रखना चाहिये कि वह तप सात्त्विक रूप हो ; राजस - तामस न हो ।

योगमार्ग की सफलता के लिये सात्विक तप ही उपयोगी होता है ।

जो व्यक्ति तपस्वी नहीं है , वह योगमार्ग में सफल नहीं हो सकता।

स्वाध्याय इस पद के दो भाग हैं - स्व और अध्याय । स्व के चार अर्थ हैं - आत्मा , आत्मीय अथवा आत्मसम्बन्धी , ज्ञाति ( बन्धु - बान्धव ) और धन । अध्याय कहते है - चिन्तन , मनन अथवा अध्ययन को । आत्मविषयक चिंतन व मनन करना , तत्सम्बन्धी ग्रंथों का अध्ययन , मनन तथा ' प्रणव ' आदि का जप करना स्वाध्याय है। पूर्वकालिक योगी जनों की जीवनगाथाओं का पर्यावलोचन , का अध्ययन , मनन भी इसके अंतर्गत समझना चाहिये। शरीर - रचना ( स्थूल , सूक्ष्म , कारण ), शरीर में स्थित विभिन्न संस्थान , उसके पञ्च - कोशों की रचना व कार्यकरण का अध्ययन , चिंतन व मनन करना। आत्मा का स्वरूप क्या है ? कहाँ से आता , कहाँ जाता है ? इत्यादि विवेचन के लिये प्रयत्नशील रहना । ज्ञाति - बन्धुबान्धव आदि की वास्तविकता को समझकर मोहवश उधर आकृष्ट न होते हुए विरक्ति की भावना को जागृत रखना। धन - सम्पत्ति आदि की ओर अधिक आकृष्ट न होना , उसका लोभी न बनना। धन की नश्वरता को समझते हुए निर्वाहोपयोगी मात्रा में आस्था रखना । बाह्य सहयोग पाकर मठ खड़ा करने की प्रवृत्तियों से बचना। यह सब योगमार्ग में भयावह बाधक होता है। इसलिये इन परस्थितियों से साधक सदा विचारपूर्वक बचने का प्रयत्न करता रहे । इनमें लिपटकर साधक पहला थोड़ा - बहुत किया - कराया भी खो बैठता है । स्वाध्याय से साधक को अपने अभिलषित मार्ग पर चलने का प्रोत्साहन प्राप्त होता है । चित्त सदा प्रसन्न बना रहता है , और योगानुष्ठान में चित्त की एकाग्रता बढ़ने लगती है ।

आत्मविषयक चिंतन व मनन करना , तत्सम्बन्धी ग्रंथों का अध्ययन , मनन तथा ' प्रणव ' आदि का जप करना स्वाध्याय है।

पूर्वकालिक योगी जनों की जीवनगाथाओं का पर्यावलोचन , का अध्ययन , मनन भी इसके अंतर्गत समझना चाहिये।

शरीर - रचना ( स्थूल , सूक्ष्म , कारण ), शरीर में स्थित विभिन्न संस्थान , उसके पञ्च - कोशों की रचना व कार्यकरण का अध्ययन , चिंतन व मनन करना।

आत्मा का स्वरूप क्या है ? कहाँ से आता , कहाँ जाता है ? इत्यादि विवेचन के लिये प्रयत्नशील रहना ।

ज्ञाति - बन्धुबान्धव आदि की वास्तविकता को समझकर मोहवश उधर आकृष्ट न होते हुए विरक्ति की भावना को जागृत रखना।

धन - सम्पत्ति आदि की ओर अधिक आकृष्ट न होना , उसका लोभी न बनना। धन की नश्वरता को समझते हुए निर्वाहोपयोगी मात्रा में आस्था रखना । बाह्य सहयोग पाकर मठ खड़ा करने की प्रवृत्तियों से बचना।

यह सब योगमार्ग में भयावह बाधक होता है। इसलिये इन परस्थितियों से साधक सदा विचारपूर्वक बचने का प्रयत्न करता रहे । इनमें लिपटकर साधक पहला थोड़ा - बहुत किया - कराया भी खो बैठता है ।

स्वाध्याय से साधक को अपने अभिलषित मार्ग पर चलने का प्रोत्साहन प्राप्त होता है । चित्त सदा प्रसन्न बना रहता है , और योगानुष्ठान में चित्त की एकाग्रता बढ़ने लगती है ।

जीव के पञ्चकोश इन पाँच कोशों से जीव सब प्रकार के कर्म , उपासना और ज्ञानादि व्यवहार करता है - अन्नमय - शरीर में त्वचा से लेकर अस्थि तक का समुदाय पृथिवीमय है। यह आत्मा का सबसे बाहरी आवेष्ठन स्थूल शरीर है। प्राणमय - प्राण , अपान , समान , व्यान , उदान। शरीर की विभिन्न प्रणालियों और इन्द्रियों की नियंत्रक पाँच प्राण वायु। मनोमय – मन और अहंकार - अंतःकरण एवं पाँच कर्मेन्द्रियाँ। सूक्ष्म शरीर का क्रियाप्रधान भाग । विज्ञानमय - बुद्धि , और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ - जिनसे जीव ज्ञानादि व्यवहार करता है। सूक्ष्म शरीर का ज्ञानप्रधान भाग। आनन्दमय - जिसमें प्रीति , प्रसन्नता , न्यून आनन्द , आनन्द , अधिकानन्द और आधार कारणरूप प्रकृति है। तुरीय शरीर का भाग।

इन पाँच कोशों से जीव सब प्रकार के कर्म , उपासना और ज्ञानादि व्यवहार करता है -

अन्नमय -

शरीर में त्वचा से लेकर अस्थि तक का समुदाय पृथिवीमय है। यह आत्मा का सबसे बाहरी आवेष्ठन स्थूल शरीर है।

प्राणमय -

प्राण , अपान , समान , व्यान , उदान। शरीर की विभिन्न प्रणालियों और इन्द्रियों की नियंत्रक पाँच प्राण वायु।

मनोमय –

मन और अहंकार - अंतःकरण एवं पाँच कर्मेन्द्रियाँ। सूक्ष्म शरीर का क्रियाप्रधान भाग ।

विज्ञानमय -

बुद्धि , और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ - जिनसे जीव ज्ञानादि व्यवहार करता है। सूक्ष्म शरीर का ज्ञानप्रधान भाग।

आनन्दमय -

जिसमें प्रीति , प्रसन्नता , न्यून आनन्द , आनन्द , अधिकानन्द और आधार कारणरूप प्रकृति है। तुरीय शरीर का भाग।

मुख्य प्राण और गौणप्राण प्राण - नासिका के अग्र भाग से हृदय तक , फेफड़े के आस - पास का भाग। फेफड़े व हृदय को शक्ति प्रदान करता है। अपान - नाभि से नीचे पेडू , गुदा , पैर के अंगुष्ठ तक। मलों का निष्कासन करता है। उदान - कण्ठ या गुद्दी के ऊपर से भृकुटि के मध्य एवं मूर्द्धा तक ; जो पिट्यूटरी और पीनियल ग्रंथि को क्रियाशील करता है। समान - कण्ठ से नाभि तक तथा उसके आस - पास जो पाचन - तंत्र को नियंत्रित करता और सर्वत्र शरीर में रस पहुँचाता है। व्यान - स्वाधिष्ठान चक्रसे सम्बद्ध होकर सारे शरीर में चेष्टा आदि कर्म करता है और गतिविधियों को नियंत्रित करता है। नाग - नाभि से थोड़ा ऊपर कूर्म - आँख की पलकों में ; पलक झपकाना . देवदत्त - श्वासनली के ऊपरी किनारे और गले में : छींकना कृंकल - होजरी के ऊपर और श्वास नली के किनारे धनञ्जय - अस्थि , मांस , त्वचा , रक्त , ज्ञानतंतु , बाल आदि में

प्राण - नासिका के अग्र भाग से हृदय तक , फेफड़े के आस - पास का भाग। फेफड़े व हृदय को शक्ति प्रदान करता है।

अपान - नाभि से नीचे पेडू , गुदा , पैर के अंगुष्ठ तक। मलों का निष्कासन करता है।

उदान - कण्ठ या गुद्दी के ऊपर से भृकुटि के मध्य एवं मूर्द्धा तक ; जो पिट्यूटरी और पीनियल ग्रंथि को क्रियाशील करता है।

समान - कण्ठ से नाभि तक तथा उसके आस - पास जो पाचन - तंत्र को नियंत्रित करता और सर्वत्र शरीर में रस पहुँचाता है।

व्यान - स्वाधिष्ठान चक्रसे सम्बद्ध होकर सारे शरीर में चेष्टा आदि कर्म करता है और गतिविधियों को नियंत्रित करता है।

नाग - नाभि से थोड़ा ऊपर

कूर्म - आँख की पलकों में ; पलक झपकाना .

देवदत्त - श्वासनली के ऊपरी किनारे और गले में : छींकना

कृंकल - होजरी के ऊपर और श्वास नली के किनारे

धनञ्जय - अस्थि , मांस , त्वचा , रक्त , ज्ञानतंतु , बाल आदि में

शरीर - रचना स्थूल शरीर - शरीर जो यह दिखायी पड़ता है। सूक्ष्म शरीर - अठारह तत्त्वों का समुदाय जो जन्ममरण आदि में भी आत्मा के साथ रहता है। इसके दो भाग हैं - भौतिक भाग - इसे कारण शरीर भी कहते हैं ; यह अभौतिक शरीर का आधार है । जिसमें सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा होती है। वह प्रकृतिरूप होने से सर्वत्र विभु और सब जीवों के लिये एक है। यह सूक्ष्मभूतों के अंशों से बना है - पाँच तन्मात्र अथवा सूक्ष्मभूत अभौतिक भाग - यह मुक्ति में भी रहता है और मुक्ति में सुख भोगता है। तेरह करणोंवाला जो जीव के स्वाभाविक गुणरूप हैं - तीन अंतःकरण - बुद्धि , अहंकार , मन ; दस बाह्यकरण - पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ ; तुरीय शरीर - इ समें समाधि से परमात्मा के आनन्दरूप में जीव मग्न होते हैं। इसी समाधि - संस्कारजन्य शुद्ध शरीर का पराक्रम मुक्ति में भी यथावत् सहायक रहता है।

स्थूल शरीर - शरीर जो यह दिखायी पड़ता है।

सूक्ष्म शरीर - अठारह तत्त्वों का समुदाय जो जन्ममरण आदि में भी आत्मा के साथ रहता है। इसके दो भाग हैं -

भौतिक भाग -

इसे कारण शरीर भी कहते हैं ; यह अभौतिक शरीर का आधार है ।

जिसमें सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा होती है।

वह प्रकृतिरूप होने से सर्वत्र विभु और सब जीवों के लिये एक है।

यह सूक्ष्मभूतों के अंशों से बना है -

पाँच तन्मात्र अथवा सूक्ष्मभूत

अभौतिक भाग -

यह मुक्ति में भी रहता है और मुक्ति में सुख भोगता है।

तेरह करणोंवाला जो जीव के स्वाभाविक गुणरूप हैं -

तीन अंतःकरण - बुद्धि , अहंकार , मन ;

दस बाह्यकरण - पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ ;

तुरीय शरीर - इ समें समाधि से परमात्मा के आनन्दरूप में जीव मग्न होते हैं।

इसी समाधि - संस्कारजन्य शुद्ध शरीर का पराक्रम मुक्ति में भी यथावत् सहायक रहता है।

ईश्वरप्रणिधान अनन्य भक्तिभाव से ईश्वर का आराधन - चिंतन करना ; शास्त्रीय पद्धति से ' प्रणव ' जप के द्वारा प्रभु की उपासना करना। प्रत्येक कार्य परमात्मा में समर्पण भावना से सम्पन्न करना। अपने आप को पूर्णरूप से परमेश्वर में समर्पित कर देना। ऐसी स्थिति में साधक जो कार्य करता है , उसमें स्वार्थ , पक्षपात व लोभ आदि की भावना उभरने नहीं पाती। इससे चित्त की निर्मलता के लिये - अर्थात् चित्त में राग - द्वेष आदि मल उभरने न पायें , ऐसी स्थिति के लिये - उपयुक्त सहयोग प्राप्त होता है। फलस्वरूप साधक का मार्ग निर्बाध बना रहता है।

अनन्य भक्तिभाव से ईश्वर का आराधन - चिंतन करना ; शास्त्रीय पद्धति से ' प्रणव ' जप के द्वारा प्रभु की उपासना करना।

प्रत्येक कार्य परमात्मा में समर्पण भावना से सम्पन्न करना।

अपने आप को पूर्णरूप से परमेश्वर में समर्पित कर देना।

ऐसी स्थिति में साधक जो कार्य करता है , उसमें स्वार्थ , पक्षपात व लोभ आदि की भावना उभरने नहीं पाती।

इससे चित्त की निर्मलता के लिये - अर्थात् चित्त में राग - द्वेष आदि मल उभरने न पायें , ऐसी स्थिति के लिये - उपयुक्त सहयोग प्राप्त होता है।

फलस्वरूप साधक का मार्ग निर्बाध बना रहता है।

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥ 2/2 ॥ [53] समाधि की भावना प्रयोजन है , क्लेशों का कम करना प्रयोजन है और। क्रियायोग के आचरण व अनुष्ठान का आचार्य सूत्रकार ने प्रयोजन बताया - क्रियायोग का पहला प्रयोजन है - समाधि भावना को दृढ़ करना व जागृत रखना क्रियायोग के निरंतर अनुष्ठान से समाधिप्राप्ति के लिये एक भावना जागृत हो जाती है। साधक का विचार व चिंतन उस अवस्था के लिये दृढ़ व आस्था पूर्ण हो उठता है , जो समाधि का पूर्णरूप है। क्रियायोग का दूसरा प्रयोजन है - क्लेशों का तनूकरण ( किसी वस्तु - काष्ठ , प्रस्तर आदि को छील - छील कर , तछकर छोटा करना ) । क्रियायोग के अनुष्ठान से क्लेश धीरे - धीरे क्षीण होते चलेजाते हैं। कालांतर में विवेकख्याति के निरुपद्रव होजाने पर समस्त क्लेश जड़ से उखाड़ फेंक दिये जाते हैं। जैसे व्याधि आदि अवस्थाओं को चित्त की एकाग्रता के लिये विक्षेप - विघ्न , बाधक व अन्तराय बताया गया ; वैसे ही क्लेश चित्त को सदा विक्षिप्त बनाये रखते हैं ; एकाग्रता में बाधा डालने वाली ऐसी बाधाओं को क्रियायोग का अनुष्ठान दूर कर देता है ।

क्रियायोग के आचरण व अनुष्ठान का आचार्य सूत्रकार ने प्रयोजन बताया -

क्रियायोग का पहला प्रयोजन है -

समाधि भावना को दृढ़ करना व जागृत रखना

क्रियायोग के निरंतर अनुष्ठान से समाधिप्राप्ति के लिये एक भावना जागृत हो जाती है।

साधक का विचार व चिंतन उस अवस्था के लिये दृढ़ व आस्था पूर्ण हो उठता है , जो समाधि का पूर्णरूप है।

क्रियायोग का दूसरा प्रयोजन है -

क्लेशों का तनूकरण

( किसी वस्तु - काष्ठ , प्रस्तर आदि को छील - छील कर , तछकर छोटा करना ) ।

क्रियायोग के अनुष्ठान से क्लेश धीरे - धीरे क्षीण होते चलेजाते हैं।

कालांतर में विवेकख्याति के निरुपद्रव होजाने पर समस्त क्लेश जड़ से उखाड़ फेंक दिये जाते हैं।

जैसे व्याधि आदि अवस्थाओं को चित्त की एकाग्रता के लिये विक्षेप - विघ्न , बाधक व अन्तराय बताया गया ; वैसे ही क्लेश चित्त को सदा विक्षिप्त बनाये रखते हैं ;

एकाग्रता में बाधा डालने वाली ऐसी बाधाओं को क्रियायोग का अनुष्ठान दूर कर देता है ।

अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः ॥ 2/3 ॥ [54] अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष , अभिनिवेश पाँच क्लेश हैं । समाधि का विवरण प्रथम पाद में आ चुका है । अब ' क्लेश क्या और कितने हैं ?' जिनको तछना है , यह सूत्रकार ने बताया है - अविद्या आदि ये सब भाव मानव मात्र को क्लेश पहुँचाते हैं , दुःखी करते हैं , इसी कारण इनको ' क्लेश ' कहाजाता है। जब इनका प्रवाह चालू रहता है , तो ये सत्त्व - रजस् - तमस् गुणों के सहयोग से आत्मा के सुख - दुःख आदि भोगाधिकार को दृढ़ बनाते हैं। तथा महत् , अहंकार , मन , इन्द्रिय , तन्मात्र , सूक्ष्म - स्थूल - भूत आदि के रूप में प्रकृति - परिणाम को निरंतर चालू रखते हैं। पदार्थों के कार्य - कारण भाव को उजागर करते हैं। यह अविद्या आदि का प्रभाव है , जो इसप्रकार विविधरूप में संसार चल रहा हैं। यह सब पुरुष अर्थात् आत्मा के कर्मफलरूप भोग व अपवर्गरूप प्रयोजन को सम्पन्न करने के लिये है । इसमें कर्म और क्लेश एक - दूसरे के अनुग्रह के अधीन रहकर अपना कार्य करते हुए कर्मफलों को सम्पन्न करते हैं , जो जाति , आयु और भोग के रूप में व्यवस्थित हैं। अविद्या मिथ्या ज्ञान अथवा विपर्यय को कहते हैं । अस्मिता आदि क्लेशों का मूल कारण अविद्या है । इसलिये अन्य सब क्लेश विपर्यय के अंतर्गत परिगणित होते हैं ।

समाधि का विवरण प्रथम पाद में आ चुका है । अब ' क्लेश क्या और कितने हैं ?' जिनको तछना है , यह सूत्रकार ने बताया है -

अविद्या आदि ये सब भाव मानव मात्र को क्लेश पहुँचाते हैं , दुःखी करते हैं , इसी कारण इनको ' क्लेश ' कहाजाता है।

जब इनका प्रवाह चालू रहता है , तो ये सत्त्व - रजस् - तमस् गुणों के सहयोग से आत्मा के सुख - दुःख आदि भोगाधिकार को दृढ़ बनाते हैं।

तथा महत् , अहंकार , मन , इन्द्रिय , तन्मात्र , सूक्ष्म - स्थूल - भूत आदि के रूप में प्रकृति - परिणाम को निरंतर चालू रखते हैं।

पदार्थों के कार्य - कारण भाव को उजागर करते हैं।

यह अविद्या आदि का प्रभाव है , जो इसप्रकार विविधरूप में संसार चल रहा हैं।

यह सब पुरुष अर्थात् आत्मा के कर्मफलरूप भोग व अपवर्गरूप प्रयोजन को सम्पन्न करने के लिये है ।

इसमें कर्म और क्लेश एक - दूसरे के अनुग्रह के अधीन रहकर अपना कार्य करते हुए कर्मफलों को सम्पन्न करते हैं , जो जाति , आयु और भोग के रूप में व्यवस्थित हैं।

अविद्या मिथ्या ज्ञान अथवा विपर्यय को कहते हैं । अस्मिता आदि क्लेशों का मूल कारण अविद्या है । इसलिये अन्य सब क्लेश विपर्यय के अंतर्गत परिगणित होते हैं ।

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥ 2/4 ॥ [55] अविद्या - विपर्यय क्षेत्र - उत्पत्ति स्थान - आधारभूत कारण है अगलों का - अस्मिता आदि का प्रसुप्त , तनु , विच्छिन्न और उदारों का। अस्मिता आदि क्लेश अविद्यामूलक हैं , इसी तथ्य को आचार्य सूत्रकार ने यहाँ बताया है - प्रसुप्त , तनु , विच्छिन्न और उदार रूप में उपलब्ध होनेवाले अस्मिता आदि चार क्लेशों का आधारभूत उत्पत्ति स्थान है - अविद्या । क्लेशों के चार रूप ये हैं - प्रसुप्त - उस समय कहे जाते हैं जब वे अपना कार्य नहीं कर रहे होते ; संस्काररूप में सोये पड़े रहते हैं। तनु - उस समय कहलाते हैं जब क्रियायोग आदि के अनुष्ठान से क्लेशों को तछकर शिथिल - मन्द बना दियाजाता है। विच्छिन्न - ये रूप तब होता हैं , जब सजातीय अथवा विजातीय संस्कारों से क्लेश दबे हुए रहते हैं। उदार - यह रूप उस समय होता है , जब उनके भोग का वर्तमान काल है । अपने पूरे वेग से उभरकर कार्यरत रहते हैं।

अस्मिता आदि क्लेश अविद्यामूलक हैं , इसी तथ्य को आचार्य सूत्रकार ने यहाँ बताया है -

प्रसुप्त , तनु , विच्छिन्न और उदार रूप में उपलब्ध होनेवाले अस्मिता आदि चार क्लेशों का आधारभूत उत्पत्ति स्थान है - अविद्या । क्लेशों के चार रूप ये हैं -

प्रसुप्त -

उस समय कहे जाते हैं जब वे अपना कार्य नहीं कर रहे होते ; संस्काररूप में सोये पड़े रहते हैं।

तनु -

उस समय कहलाते हैं जब क्रियायोग आदि के अनुष्ठान से क्लेशों को तछकर शिथिल - मन्द बना दियाजाता है।

विच्छिन्न -

ये रूप तब होता हैं , जब सजातीय अथवा विजातीय संस्कारों से क्लेश दबे हुए रहते हैं।

उदार -

यह रूप उस समय होता है , जब उनके भोग का वर्तमान काल है । अपने पूरे वेग से उभरकर कार्यरत रहते हैं।

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥ 2/5 ॥ [56] अनित्य , अपवित्र , दुःख और अनात्मा में नित्य , पवित्र , सुख और आत्मा का ज्ञान होना अविद्या है। जो वस्तु जैसी है उसको वैसा न समझकर उसके विपरीत समझना अविद्या कहा जाता है - अनित्य ( मरणशील ) में नित्य ज्ञान , अविद्या है । अपवित्र में पवित्रज्ञान अविद्या है । दुःख में सुखज्ञान अविद्या है । अनात्मा ( अचेतन ) में आत्म ( चेतन ) ज्ञान अविद्या है। आत्मा के बन्ध का कारण अविद्या के ये चार स्थान हैं। अन्य समस्त क्लेश , कर्माशय और उनके विपाक - फल आदि का मूल यही चतुष्पदा अविद्या है । सीप को चाँदी , रस्सी को साँप , मृगमरीचिका को जलप्रवाह समझना आदि सब अविद्या का क्षेत्र है। प्रत्येक प्राणी अपने जीवन में पग - पग पर अविद्या के विविध रूपों में डूबा - उतराया करता है ; परंतु , वह उसे यथार्थ समझता है : यही अविद्या है। इसी को भ्रम , मिथ्याज्ञान , विपर्ययज्ञान आदि कहते हैं।

जो वस्तु जैसी है उसको वैसा न समझकर उसके विपरीत समझना अविद्या कहा जाता है -

अनित्य ( मरणशील ) में नित्य ज्ञान , अविद्या है ।

अपवित्र में पवित्रज्ञान अविद्या है ।

दुःख में सुखज्ञान अविद्या है ।

अनात्मा ( अचेतन ) में आत्म ( चेतन ) ज्ञान अविद्या है।

आत्मा के बन्ध का कारण अविद्या के ये चार स्थान हैं। अन्य समस्त क्लेश , कर्माशय और उनके विपाक - फल आदि का मूल यही चतुष्पदा अविद्या है ।

सीप को चाँदी , रस्सी को साँप , मृगमरीचिका को जलप्रवाह समझना आदि सब अविद्या का क्षेत्र है।

प्रत्येक प्राणी अपने जीवन में पग - पग पर अविद्या के विविध रूपों में डूबा - उतराया करता है ; परंतु , वह उसे यथार्थ समझता है : यही अविद्या है। इसी को भ्रम , मिथ्याज्ञान , विपर्ययज्ञान आदि कहते हैं।

अविद्या अविद्या का अर्थ विद्या - ज्ञान का अभाव नहीं , प्रत्युत विपरीत ज्ञान है । वस्तु का यथार्थज्ञान न होकर विपरीत ज्ञान होना अविद्या है । अविद्या का स्वरूप - यह देह अस्थि , मांस , मज्जा , त्वचा आदि का संग्रह एवं मल - मूत्र आदि से भरा हुआ है ; तथा प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति इसे पैदा होता तथा नष्ट होता देखता है ; फिर भी अज्ञानी अविवेकी व्यक्ति इसमें नित्य व पवित्र बुद्धि रखता है : यह अविद्या का स्वरूप है । व्यक्ति अर्थ ( धन - दौलत , सम्पत्ति ) और विषयों के सेवन को - जो नितान्त हानिजनक और दु : खरूप हैं - सुख समझता है : यह अविद्या का स्वरूप है । व्यक्ति देह , इन्द्रिय , बुद्धि आदि अचेतन जड़ पदार्थों को चेतन - ज्ञानरूप आत्मा समझता है : यह अविद्या का रूप है । सीप को चाँदी , रस्सी को साँप , भरी दुपहरी के समय भूमि से उभरती ऊष्मा का सूर्यकिरणों से मिलकर जो लहरिया दिखाई देने लगता है , उसे ठाठें मारता जलप्रवाह समझना आदि सब अविद्या का क्षेत्र है । प्रत्येक प्राणी अपने जीवन में पग - पग पर अविद्या के विविधरूपों में डूबा - उतराया करता है ; परन्तु , वह उसे यथार्थ समझता है - यही अविद्या है । इसी को भ्रम , मिथ्याज्ञान , विपर्ययज्ञान आदि पदों से व्यवहृत किया जाता है ।

अविद्या का अर्थ विद्या - ज्ञान का अभाव नहीं , प्रत्युत विपरीत ज्ञान है । वस्तु का यथार्थज्ञान न होकर विपरीत ज्ञान होना अविद्या है ।

अविद्या का स्वरूप -

यह देह अस्थि , मांस , मज्जा , त्वचा आदि का संग्रह एवं मल - मूत्र आदि से भरा हुआ है ; तथा प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति इसे पैदा होता तथा नष्ट होता देखता है ; फिर भी अज्ञानी अविवेकी व्यक्ति इसमें नित्य व पवित्र बुद्धि रखता है : यह अविद्या का स्वरूप है ।

व्यक्ति अर्थ ( धन - दौलत , सम्पत्ति ) और विषयों के सेवन को - जो नितान्त हानिजनक और दु : खरूप हैं - सुख समझता है : यह अविद्या का स्वरूप है ।

व्यक्ति देह , इन्द्रिय , बुद्धि आदि अचेतन जड़ पदार्थों को चेतन - ज्ञानरूप आत्मा समझता है : यह अविद्या का रूप है ।

सीप को चाँदी , रस्सी को साँप , भरी दुपहरी के समय भूमि से उभरती ऊष्मा का सूर्यकिरणों से मिलकर जो लहरिया दिखाई देने लगता है , उसे ठाठें मारता जलप्रवाह समझना आदि सब अविद्या का क्षेत्र है ।

प्रत्येक प्राणी अपने जीवन में पग - पग पर अविद्या के विविधरूपों में डूबा - उतराया करता है ; परन्तु , वह उसे यथार्थ समझता है - यही अविद्या है ।

इसी को भ्रम , मिथ्याज्ञान , विपर्ययज्ञान आदि पदों से व्यवहृत किया जाता है ।

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥ 2/6 ॥ [57] दृक् शक्ति और दर्शन शक्ति की एकरूपता जैसा - सा ( भान होना , प्रतीत होना ) अस्मिता नामक क्लेश है। दृक् शक्ति द्रष्टा आत्मा है - चेतन तत्त्व। दर्शनशक्ति देखने का साधन है - बुद्धितत्त्व - जड़ प्राकृतिक अर्थात् प्रकृति का कार्य। इन दोनों की एकरूपता जैसी प्रतीत होना अस्मिता नामक क्लेश है। आत्मा शुद्ध चेतन अपरिणामी तत्त्व है ; इसके विपरीत बुद्धितत्त्व अशुद्ध रागादि मलों का जनक , जड़ तथा परिणामी है। इनके सर्वथा भिन्न स्वरूप होने पर भी जिस स्थिति में इनकी एकरूपता - जैसी प्रतीत हो , वह अस्मिता है। बुद्धि आदि के सहयोग से ही आत्मा सांसारिक रूप रस आदि विषयों का भोग तथा सुख - दुःख आदि द्वन्द्वों का अनुभव किया करता है। इसका कारण अविवेक ( दृक्शक्ति तथा दर्शनशक्ति के विवेकभेद को न जानना ) अथवा अविद्या है।

दृक् शक्ति द्रष्टा आत्मा है - चेतन तत्त्व।

दर्शनशक्ति देखने का साधन है - बुद्धितत्त्व - जड़ प्राकृतिक अर्थात् प्रकृति का कार्य। इन दोनों की एकरूपता जैसी प्रतीत होना अस्मिता नामक क्लेश है।

आत्मा शुद्ध चेतन अपरिणामी तत्त्व है ; इसके विपरीत बुद्धितत्त्व अशुद्ध रागादि मलों का जनक , जड़ तथा परिणामी है।

इनके सर्वथा भिन्न स्वरूप होने पर भी जिस स्थिति में इनकी एकरूपता - जैसी प्रतीत हो , वह अस्मिता है।

बुद्धि आदि के सहयोग से ही आत्मा सांसारिक रूप रस आदि विषयों का भोग तथा सुख - दुःख आदि द्वन्द्वों का अनुभव किया करता है।

इसका कारण अविवेक ( दृक्शक्ति तथा दर्शनशक्ति के विवेकभेद को न जानना ) अथवा अविद्या है।

सुखानुशयी रागः ॥ 2/7 ॥ [58] सुख का अनुशयन - अनुसरण करनेवाला ( भाव ), राग नामक क्लेश है। पहिले भोगे हुए सुख को याद करते हुए , वैसे सुख और उसके साधनों में , व्यक्ति को

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