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दर्शन सिद्धान्त

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Information about दर्शन सिद्धान्त
Spiritual

Published on February 19, 2009

Author: Sanjayakumar

Source: slideshare.net

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* दर्शन सिद्धान्त * भारतीय वैदिक दर्शन के मुख्य आधार

विषय - सूची सृष्टि - रचना के मूल तत्त्व परमात्मा जीवात्मा प्रकृति वेदों का ज्ञान सृष्टि के कारण सृष्टि - रचना 25 तत्त्व दर्शन शास्त्र दर्शनों में विवेचित विषय ईश्वर स्तुति - प्रार्थना - उपासना स्तुति - प्रार्थना - उपासना का फल उपासना - योग उपासना कैसे करें ? समाधि हेतु प्राणायाम मोक्ष - मुक्ति मुक्ति का स्वरूप मुक्ति का समय मुक्ति के साधन मुक्ति के विशेष उपाय (1-6)

सृष्टि - रचना के मूल तत्त्व

परमात्मा

जीवात्मा

प्रकृति

वेदों का ज्ञान

सृष्टि के कारण

सृष्टि - रचना 25 तत्त्व

दर्शन शास्त्र

दर्शनों में विवेचित विषय

ईश्वर स्तुति - प्रार्थना - उपासना

स्तुति - प्रार्थना - उपासना का फल

उपासना - योग

उपासना कैसे करें ?

समाधि हेतु प्राणायाम

मोक्ष - मुक्ति

मुक्ति का स्वरूप

मुक्ति का समय

मुक्ति के साधन

मुक्ति के विशेष उपाय (1-6)

सृष्टि - रचना के मूल तत्त्व सृष्टि की यथार्थता की तात्त्विक व्याख्या के लिये ऋषियों ने तीन मूलभूत तत्त्वों का अस्तित्व स्वीकार किया है - 1. ईश्वर - ( परमात्मा ) : अध्यात्म - चेतन तत्त्व , 2. जीव - ( आत्मा ) : अध्यात्म - चेतन तत्त्व , 3. प्रकृति - ( प्रधान ) : अधिभूत - जड़ तत्त्व . सृष्टि रचना के ये तीन मूल कारण अनादि , अमूल और नित्य हैं। सृष्टि प्रवाह से अनादि है ; अर्थात् , सृष्टि के प्रलय और सर्ग काल , अनंत काल से आते - जाते रहे हैं : और इसी प्रकार चलते रहेंगे ।

सृष्टि की यथार्थता की तात्त्विक व्याख्या के लिये ऋषियों ने तीन मूलभूत तत्त्वों का अस्तित्व स्वीकार किया है -

सृष्टि रचना के ये तीन मूल कारण अनादि , अमूल और नित्य हैं।

सृष्टि प्रवाह से अनादि है ; अर्थात् , सृष्टि के प्रलय और सर्ग काल , अनंत काल से आते - जाते रहे हैं : और इसी प्रकार चलते रहेंगे ।

परमात्मा अध्यात्म - चेतन तत्त्व, परम पुरुष, सबका दृष्टा. सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता . सृष्टि-रचना का मुख्य निमित्त कारण. प्रकृति एवं उसके विकार का प्रेरक, नियामक और अधिष्ठाता. जीवात्माओं को उनके अच्छे-बुरे कर्मानुसार फल देने वाला. सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं; उन सब का आदि मूल.

अध्यात्म - चेतन तत्त्व, परम पुरुष, सबका दृष्टा.

सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता .

सृष्टि-रचना का मुख्य निमित्त कारण.

प्रकृति एवं उसके विकार का प्रेरक, नियामक और अधिष्ठाता.

जीवात्माओं को उनके अच्छे-बुरे कर्मानुसार फल देने वाला.

सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं; उन सब का आदि मूल.

जीवात्मा अध्यात्म, चेतन तत्त्व - पुरुष; प्रकृति का एकमात्र दृष्टा व भोक्ता. आत्मा का स्वरूप - नित्य - उत्पत्ति-विनाशहीन,अजर, अमर, अजन्मा, अनादि . शुद्ध - निर्विकार, पवित्र, अपरिणामी मुक्त - प्रकृति के सत्वरजस्तमोगुणों से सर्वथा भिन्न, निर्गुण बुद्ध - ज्ञान-अर्जन तथा अनुभव करने में समर्थ किंतु अल्पज्ञ. सक्रिय - गतिशील, लोक-लोकान्तरों गति-आगति में समर्थ अणु -अति सूक्ष्म, एकदेशीय अनेक - संख्या में अनेक किन्तु एकस्वरूप. कर्ता- कर्म करने में स्वतंत्र किंतु कर्म-फल भोगने में परतंत्र. विश्व-रचना में जीवात्मा साधारण निमित्त कारण भी है .

अध्यात्म, चेतन तत्त्व - पुरुष; प्रकृति का एकमात्र दृष्टा व भोक्ता.

आत्मा का स्वरूप -

नित्य - उत्पत्ति-विनाशहीन,अजर, अमर, अजन्मा, अनादि .

शुद्ध - निर्विकार, पवित्र, अपरिणामी

मुक्त - प्रकृति के सत्वरजस्तमोगुणों से सर्वथा भिन्न, निर्गुण

बुद्ध - ज्ञान-अर्जन तथा अनुभव करने में समर्थ किंतु अल्पज्ञ.

सक्रिय - गतिशील, लोक-लोकान्तरों गति-आगति में समर्थ

अणु -अति सूक्ष्म, एकदेशीय

अनेक - संख्या में अनेक किन्तु एकस्वरूप.

कर्ता- कर्म करने में स्वतंत्र किंतु कर्म-फल भोगने में परतंत्र.

विश्व-रचना में जीवात्मा साधारण निमित्त कारण भी है .

प्रकृति सत्त्व , रजस् , तमस् इन तीन गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति नाम से कहा जाता है। इसका कोई कारण न होने से इसे अलिंग या प्रधान भी कहते हैं। यह अधिभूत - अचेतन , जड़ तत्त्व अमूल ( इसका कोई कारण नहीं ) है। प्रकृति के विकार ( ये तीन गुण , विभिन्न अनुपातों में , परस्पर मिथिनीभूत होकर ) समस्त विश्व - रचना के उपादान कारण बनते हैं . प्रकृति से बनी सृष्टि - रचना को शास्त्रों में दृश्य कहा गया है। प्रकृति प्रवाह से अनादि , नित्य , किंतु परिवर्तनशील , परिणामी अर्थात् लगातार रूप बदलने वाली है।

सत्त्व , रजस् , तमस् इन तीन गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति नाम से कहा जाता है।

इसका कोई कारण न होने से इसे अलिंग या प्रधान भी कहते हैं।

यह अधिभूत - अचेतन , जड़ तत्त्व अमूल ( इसका कोई कारण नहीं ) है।

प्रकृति के विकार ( ये तीन गुण , विभिन्न अनुपातों में , परस्पर मिथिनीभूत होकर ) समस्त विश्व - रचना के उपादान कारण बनते हैं .

प्रकृति से बनी सृष्टि - रचना को शास्त्रों में दृश्य कहा गया है।

प्रकृति प्रवाह से अनादि , नित्य , किंतु परिवर्तनशील , परिणामी अर्थात् लगातार रूप बदलने वाली है।

वेदों का ज्ञान विश्व का आकल्पक , रचयिता , धारक , नियामक , संचालक , रक्षक और संहारक परमात्मा , सृष्टि के आरम्भ में ही , समस्त मानव जाति के कल्याण के लिये वेदों का ज्ञान देता है। जैसे माता - पिता अपने संतानों पर कृपादृष्टि कर उनकी उन्नति चाहते हैं , वैसे ही परमात्मा ने सब मनुष्यों पर कृपा करके वेदों को प्रकाशित किया है ; जिससे मनुष्य अविद्यान्धकार एवं भ्रमजाल से छूटकर विद्या - विज्ञानरूप सूर्य को प्राप्तकर अत्यानन्द में रहें , और विद्या तथा सुखों की वृद्धि करते जाएँ। वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है . उसमें वर्णित ज्ञान नित्य है। चार वेद और उनमें वर्णित विषय हैं - ऋग्वेद - ज्ञान काण्ड , यजुर्वेद - कर्म काण्ड , सामवेद - उपासना काण्ड , और अथर्ववेद - विज्ञान काण्ड .

विश्व का आकल्पक , रचयिता , धारक , नियामक , संचालक , रक्षक और संहारक परमात्मा , सृष्टि के आरम्भ में ही , समस्त मानव जाति के कल्याण के लिये वेदों का ज्ञान देता है।

जैसे माता - पिता अपने संतानों पर कृपादृष्टि कर उनकी उन्नति चाहते हैं , वैसे ही परमात्मा ने सब मनुष्यों पर कृपा करके वेदों को प्रकाशित किया है ; जिससे मनुष्य अविद्यान्धकार एवं भ्रमजाल से छूटकर विद्या - विज्ञानरूप सूर्य को प्राप्तकर अत्यानन्द में रहें , और विद्या तथा सुखों की वृद्धि करते जाएँ।

वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है . उसमें वर्णित ज्ञान नित्य है।

चार वेद और उनमें वर्णित विषय हैं -

ऋग्वेद - ज्ञान काण्ड ,

यजुर्वेद - कर्म काण्ड ,

सामवेद - उपासना काण्ड , और

अथर्ववेद - विज्ञान काण्ड .

सृष्टि के कारण निमित्त कारण - जिसके द्वारा बनाये जाने से ही कुछ बने , न बनाने से कुछ न बने। अपने आप स्वयं न बने , किंतु दूसरे को प्रकारांतर से बना दे . निमित्त कारण दो प्रकार के हैं - मुख्य निमित्त कारण - सम्पूर्ण सृष्टि को , उपादान कारण - प्रकृति से बनाने , धारण करने और प्रलय करने ; तथा , सबकी व्यवस्था और नियंत्रण करने वाला - परमात्मा । साधारण निमित्त कारण - परमेश्वर की सृष्टि में से पदार्थों को लेकर अनेक प्रकार से नये कार्यों में बदलने वाला - जीव । उपादान कारण - जिसका उपयोग किये बिना कुछ न बने ; वही अवस्थांतर रूप होकर बने और बिगड़े भी - प्रकृति । साधारण कारण - किसी वस्तु को बनाने में लगने वाले साधन - उपकरण , यंत्र , ज्ञान , बल , दर्शन , समय , ऊर्जा आदि ।

निमित्त कारण - जिसके द्वारा बनाये जाने से ही कुछ बने , न बनाने से कुछ न बने। अपने आप स्वयं न बने , किंतु दूसरे को प्रकारांतर से बना दे . निमित्त कारण दो प्रकार के हैं -

मुख्य निमित्त कारण - सम्पूर्ण सृष्टि को , उपादान कारण - प्रकृति से बनाने , धारण करने और प्रलय करने ; तथा , सबकी व्यवस्था और नियंत्रण करने वाला - परमात्मा ।

साधारण निमित्त कारण - परमेश्वर की सृष्टि में से पदार्थों को लेकर अनेक प्रकार से नये कार्यों में बदलने वाला - जीव ।

उपादान कारण - जिसका उपयोग किये बिना कुछ न बने ; वही अवस्थांतर रूप होकर बने और बिगड़े भी - प्रकृति ।

साधारण कारण - किसी वस्तु को बनाने में लगने वाले साधन - उपकरण , यंत्र , ज्ञान , बल , दर्शन , समय , ऊर्जा आदि ।

सृष्टि - रचना के 24 अचेतन तत्त्व 1. समस्त कार्यों का मूल कारण ' प्रकृति ' ( प्रलय की अवस्था में सत्त्व, रजस्, तमस्, मूल तत्त्वों की साम्यावस्था) नियंता परमात्मा की प्रेरणा ( ईक्षण ) से क्षोभ ( धुड़धुड़ी ) उत्पन्न होता है , जिससे वे तत्त्व सर्गोनुमुख हो जाते हैं . इस अवस्था को ' प्रतिभा '/ ' विद्युत ' / ' आपस '/ ' मनस् ' कहा गया है । 2. प्रकृति का प्रथम कार्य - ' महत् ' ( मनन करने वाला - निश्चयात्मक अथवा अध्यवसाय स्वरूप , इसी कारण इस तत्त्व का दूसरा नाम ' बुद्धि ' है। ) 3. उसके अनंतर का कार्य - ' अहंकार ' ( अभिमान वृत्ति वाला - अस्तित्व जताने वाला -' मैं हूँ ' )

नियंता परमात्मा की प्रेरणा ( ईक्षण ) से क्षोभ ( धुड़धुड़ी ) उत्पन्न होता है , जिससे वे तत्त्व सर्गोनुमुख हो जाते हैं . इस अवस्था को ' प्रतिभा '/ ' विद्युत ' / ' आपस '/ ' मनस् ' कहा गया है ।

सृष्टि - रचना के 24 अचेतन तत्त्व 4. तामस अहंकार से उत्पन्न पाँच तन्मात्र या सूक्ष्मभूत - शब्द , स्पर्श , रूप , रस , गंध . 5. सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न पाँच ( बाह्य ) ज्ञानेन्द्रियाँ - श्रोत्र , त्वक , चक्षु , रसन , घ्राण . 6. सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न पाँच ( बाह्य ) कर्मेन्द्रियाँ - वाक् , पाणि , पाद , पायु , उपस्थ . 7. सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न एक आंतर इन्द्रिय - ' मन '. ( इन्द्रियाँ केवल विकार हैं , ये आगे किसी तत्त्वांतर को उत्पन्न नहीं करतीं ) 8. तन्मात्राओं वा सूक्ष्मभूत से उत्पन्न पाँच स्थूलभूत - आकाश , वायु , अग्नि , जल , पृथ्वी .

सृष्टि - रचना के 25 तत्त्व इससे अतिरिक्त पुरुष अर्थात् चेतन तत्त्व है । चेतन तत्त्व दो वर्गों में विभक्त है- परमात्मा - एक है । जीवात्मा - अनेक अर्थात् संख्या की दृष्टि से अनन्त हैं । पृथिवी आदि स्थूल तत्त्व इन्द्रियगोचर हैं । अन्य सूक्ष्म, सूक्ष्मतर तत्त्वों का ग्रहण इन्द्रियों से नहीं होता। इनमें मूल प्रकृति केवल उपादान, तथा महत् आदि तेईस पदार्थ उसके विकार हैं । ये चौबीस अचेतन जगत हैं । इसप्रकार चौबीस अचेतन और पच्चीसवां पुरुष चेतन है । ये हैं वे समस्त तत्त्व जिनके वास्तविक स्वरूप को पहिचान कर चेतन तथा अचेतन के भेद का साक्षात्कार करना होता है आत्म-ज्ञान के लिये ।

इससे अतिरिक्त पुरुष अर्थात् चेतन तत्त्व है ।

चेतन तत्त्व दो वर्गों में विभक्त है-

परमात्मा - एक है ।

जीवात्मा - अनेक अर्थात् संख्या की दृष्टि से अनन्त हैं ।

पृथिवी आदि स्थूल तत्त्व इन्द्रियगोचर हैं । अन्य सूक्ष्म, सूक्ष्मतर तत्त्वों का ग्रहण इन्द्रियों से नहीं होता।

इनमें मूल प्रकृति केवल उपादान, तथा महत् आदि तेईस पदार्थ उसके विकार हैं । ये चौबीस अचेतन जगत हैं ।

इसप्रकार चौबीस अचेतन और पच्चीसवां पुरुष चेतन है ।

ये हैं वे समस्त तत्त्व जिनके वास्तविक स्वरूप को पहिचान कर चेतन तथा अचेतन के भेद का साक्षात्कार करना होता है आत्म-ज्ञान के लिये ।

दर्शन शास्त्र भारतीय दर्शन शास्त्रों, उनके आधारभूत वेद, तथा अन्य वैदिक साहित्य- उपनिषदों, स्मृतियों आदि में इन तत्त्वों का विषद विवेचन है- पदार्थों की उपपत्ति (सिद्धि) के लिये प्रमाण, तर्क आदि. भौतिक, रसायन, तत्त्वों की रचना और उनके गुण आदि. सृष्टि-रचना के मूल कारण- ईश्वर, जीव, प्रकृति. जीव में स्थित बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की रचना और कार्य-प्रचालन . समाधि प्राप्त करने की विधि. बन्ध, मोक्ष और मोक्ष प्राप्ति के उपाय. जीवनयापन की शैली, यज्ञ आदि कर्म करने की विधि.

भारतीय दर्शन शास्त्रों, उनके आधारभूत वेद, तथा अन्य वैदिक साहित्य- उपनिषदों, स्मृतियों आदि में इन तत्त्वों का विषद विवेचन है-

पदार्थों की उपपत्ति (सिद्धि) के लिये प्रमाण, तर्क आदि.

भौतिक, रसायन, तत्त्वों की रचना और उनके गुण आदि.

सृष्टि-रचना के मूल कारण- ईश्वर, जीव, प्रकृति.

जीव में स्थित बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की रचना और कार्य-प्रचालन .

समाधि प्राप्त करने की विधि.

बन्ध, मोक्ष और मोक्ष प्राप्ति के उपाय.

जीवनयापन की शैली, यज्ञ आदि कर्म करने की विधि.

दर्शन शास्त्रों के विषय दर्शन शास्त्र रचयिता न्याय गोतम मुनि. वैशेषिक कणाद मुनि. सांख्य कपिल मुनि. योग पतंजलि मुनि. पूर्वमीमांसा जैमिनि मुनि. उत्तर मीमांसा व्यास मुनि. (वेदांत अथवा ब्रह्म सूत्र ) विवेचित विषय प्रमाण , उपपत्ति , तर्क विज्ञान भौतिक - रसायन विज्ञान मोक्ष एवं सृष्टि - रचना विज्ञान समाधि - प्राप्ति विज्ञान यज्ञ - कर्म विज्ञान ब्रह्म ( ईश्वर ) विज्ञान

न्याय गोतम मुनि.

वैशेषिक कणाद मुनि.

सांख्य कपिल मुनि.

योग पतंजलि मुनि.

पूर्वमीमांसा जैमिनि मुनि.

उत्तर मीमांसा व्यास मुनि. (वेदांत अथवा ब्रह्म सूत्र )

ईश्वर स्तुति - प्रार्थना - उपासना स्तुति से ईश्वर में प्रीति , उसके गुण , कर्म , स्वभाव से अपने गुण , कर्म , स्वभाव का सुधरना होता है। * प्रार्थना से निरभिमानता , उत्साह और सहाय मिलता है। * उपासना से परब्रह्म से मेल और उसका साक्षात्कार होता है। *** जिस परमात्मा ने इस जगत् के सब पदार्थ जीवों के सुख के लिये दे रक्खे हैं , उसका गुण भूल जाना , ईश्वर को ही न मानना , कृतघ्नता और मूर्खता है। इसलिये जो परमेश्वर की स्तुति , प्रार्थना और उपासना नहीं करता वह कृतघ्न और महामूर्ख भी होता है ,

जिस परमात्मा ने इस जगत् के सब पदार्थ जीवों के सुख के लिये दे रक्खे हैं , उसका गुण भूल जाना , ईश्वर को ही न मानना , कृतघ्नता और मूर्खता है।

इसलिये जो परमेश्वर की स्तुति , प्रार्थना और उपासना नहीं करता वह कृतघ्न और महामूर्ख भी होता है ,

उपासना - योग - 1 समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं भवेत् । न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयन्तदन्तःकरणेन गृह्यते ॥ - यह मैत्रायणीय उपनिषत् का वचन है। जिस पुरुष के समाधियोग से अविद्यादि मल नष्ट होगये हैं , आत्मस्थ होकर परमात्मा में चित्त जिसने लगाया है , उसको जो परमात्मा के योग का सुख होता है - वह वाणी से कहा नहीं जासकता ; क्योंकि , उस आनन्द को जीवात्मा अपने अंतःकरण से ग्रहण करता है। सर्वज्ञादि गुणों के साथ परमेश्वर की उपासना करनी सगुणोपासना ; कहलाती है । द्वेष , रूप , रस , गन्ध , स्पर्शादि गुणों से पृथक् मान , अतिसूक्ष्म आत्मा के भीतर - बाहर व्यापक परमेश्वर में दृढ़ स्थित होजाना निर्गुणोपासना कहलाती है। उपासना शब्द का अर्थ समीपस्थ होना है। अष्टांग [ यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान , समाधि ] योग से परमात्मा के समीपस्थ होने और उसको सर्वव्यापी , सर्वान्तर्यामिरूप से प्रत्यक्ष करने के लिये जो - जो काम करना होता है , वह - वह सब करना चाहिये।

सर्वज्ञादि गुणों के साथ परमेश्वर की उपासना करनी सगुणोपासना ; कहलाती है ।

द्वेष , रूप , रस , गन्ध , स्पर्शादि गुणों से पृथक् मान , अतिसूक्ष्म आत्मा के भीतर - बाहर व्यापक परमेश्वर में दृढ़ स्थित होजाना निर्गुणोपासना कहलाती है।

उपासना शब्द का अर्थ समीपस्थ होना है। अष्टांग [ यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान , समाधि ] योग से परमात्मा के समीपस्थ होने और उसको सर्वव्यापी , सर्वान्तर्यामिरूप से प्रत्यक्ष करने के लिये जो - जो काम करना होता है , वह - वह सब करना चाहिये।

उपासना - योग – 2 तत्र अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रहा यमाः ॥ [ योग सूत्र साधनपाद सू .30] जो उपासना का आरम्भ करना चाहे उसके लिये यही आरम्भ है कि वह किसी से वैर न रक्खे , सर्वदा सब से प्रीति रक्खे , मिथ्या कभी न बोले , चोरी न करे , सत्य व्यवहार करे , जितेन्द्रिय हो , लम्पट न हो , निरभिमानी हो , अभिमान कभी न करे अनावश्यक संग्रह न करे । ये पाँच प्रकार के यम मिल के उपासना योग का प्रथम अंग है ।

जो उपासना का आरम्भ करना चाहे उसके लिये यही आरम्भ है कि वह

किसी से वैर न रक्खे ,

सर्वदा सब से प्रीति रक्खे ,

मिथ्या कभी न बोले ,

चोरी न करे ,

सत्य व्यवहार करे ,

जितेन्द्रिय हो ,

लम्पट न हो ,

निरभिमानी हो ,

अभिमान कभी न करे

अनावश्यक संग्रह न करे ।

ये पाँच प्रकार के यम मिल के उपासना योग का प्रथम अंग है ।

उपासना - योग - 3 शौच संतोष तपः स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥ [ योग सूत्र साधनपाद । सू . 32 ] उपासनायोग के दूसरे अंग में पाँच प्रकार के नियम हैं - राग - द्वेष छोढ कर भीतर से और जलादि से बाहर से पवित्र रहे , प्रसन्न होकर आलस्य छोढ सदा पुरुषार्थ किया करे , धर्म से पुरुषार्थ करने से लाभ में न प्रसन्नता और हानि में न अप्रसन्नता करे , सदा दुःख सुखों का सहन और धर्म ही का अनुष्ठान करे , अधर्म का नहीं , सर्वदा सत्य शास्त्रों को पढे - पढाये सत्पुरुषों का संग करे , ' ओ 3 म् ' इस एक परमात्मा के नाम का अर्थ विचार कर नित्य - प्रति लप किया करे ; और अपने आत्मा को परमेश्वर की आज्ञानुकूल समर्पित कर देवे ।

उपासनायोग के दूसरे अंग में पाँच प्रकार के नियम हैं -

राग - द्वेष छोढ कर भीतर से और

जलादि से बाहर से पवित्र रहे ,

प्रसन्न होकर आलस्य छोढ सदा पुरुषार्थ किया करे ,

धर्म से पुरुषार्थ करने से लाभ में न प्रसन्नता और हानि में न अप्रसन्नता करे ,

सदा दुःख सुखों का सहन और धर्म ही का अनुष्ठान करे , अधर्म का नहीं ,

सर्वदा सत्य शास्त्रों को पढे - पढाये

सत्पुरुषों का संग करे ,

' ओ 3 म् ' इस एक परमात्मा के नाम का अर्थ विचार कर नित्य - प्रति लप किया करे ; और

अपने आत्मा को परमेश्वर की आज्ञानुकूल समर्पित कर देवे ।

उपासना कैसे करें ? जब उपासना करना चाहें तब एकांत शुद्ध देश में जाकर , आसन लगा , प्राणायाम कर , बाह्य विषयों से इन्द्रियों को रोक [ प्रत्याहार ], मन को नाभिप्रदेश में वा हृदय , कण्ठ , नेत्र , शिखा अथवा पीठ के मध्य हाड़ में किसी स्थान पर स्थिर [ धारणा ] कर , अपने आत्मा और परमात्मा का विवेचन [ ध्यान ] करके , परमात्मा में मग्न [ समाधिस्थ ] होकर संयमी होवें।

जब उपासना करना चाहें तब

एकांत शुद्ध देश में जाकर , आसन लगा ,

प्राणायाम कर ,

बाह्य विषयों से इन्द्रियों को रोक [ प्रत्याहार ],

मन को नाभिप्रदेश में वा हृदय , कण्ठ , नेत्र , शिखा अथवा पीठ के मध्य हाड़ में किसी स्थान पर स्थिर [ धारणा ] कर ,

अपने आत्मा और परमात्मा का विवेचन [ ध्यान ] करके ,

परमात्मा में मग्न [ समाधिस्थ ] होकर संयमी होवें।

स्तुति - प्रार्थना - उपासना का फल पुरुष जब इन साधनों को करता है , तब उसका आत्मा और अंतःकरण पवित्र होकर सत्य से पूर्ण होजाता है। नित्यप्रति ज्ञान - विज्ञान बढ़ाकर मुक्ति तक पहुँच जाता है। जैसे शीत से आतुर पुरुष का अग्नि के पास जाने से शीत निवृत्त होजाता है ; वैसे ही परमेश्वर के समीप प्राप्त होने से सब दोष - दुःख छूटकर परमेश्वर के गुण , कर्म , स्वभाव के सदृश जीवात्मा के गुण , कर्म , स्वभाव पवित्र हो जाते हैं। इससे अतिरिक्त आत्मा का बल इतना बढ़ेगा कि वह पर्वत के समान दुःख प्राप्त होने पर भी न घबरावेगा और सबको सहन कर सकेगा। यह बहुत बड़ी बात है। इसलिये परमेश्वर की स्तुति - प्रार्थना और उपासना अवश्य करनी चाहिये। जो आठ प्रहर ( चौबीस घण्टे ) में एक घड़ी ( चौबीस मिनट ) भर भी इसप्रकार ध्यान करता है वह सदा उन्नति को प्राप्त होता जाता है। *** महर्षि दयानन्द सरस्वती रचित सत्यार्थ प्रकाश से

पुरुष जब इन साधनों को करता है , तब

उसका आत्मा और अंतःकरण पवित्र होकर सत्य से पूर्ण होजाता है।

नित्यप्रति ज्ञान - विज्ञान बढ़ाकर मुक्ति तक पहुँच जाता है।

जैसे शीत से आतुर पुरुष का अग्नि के पास जाने से शीत निवृत्त होजाता है ; वैसे ही परमेश्वर के समीप प्राप्त होने से सब दोष - दुःख छूटकर परमेश्वर के गुण , कर्म , स्वभाव के सदृश जीवात्मा के गुण , कर्म , स्वभाव पवित्र हो जाते हैं।

इससे अतिरिक्त आत्मा का बल इतना बढ़ेगा कि वह पर्वत के समान दुःख प्राप्त होने पर भी न घबरावेगा और सबको सहन कर सकेगा। यह बहुत बड़ी बात है।

इसलिये परमेश्वर की स्तुति - प्रार्थना और उपासना अवश्य करनी चाहिये।

प्राण आत्मा के ज्ञान और कर्म के लिये साधनरूप दस बाह्यकरण - पाँच ज्ञानेन्द्रियों व पाँच कर्मेन्द्रियों ; तथा , चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार इनके व्यापार को सुचारु रूप से चलाने के लिये शरीर में अनेक अंतः प्रणालियाँ कार्य कर रही है जिसका साधारण मनुष्य को भान नहीं होता। ये प्रणालियाँ हैं - श्वसन , रक्तसंचार , भोजनपाचन , मलोत्सर्जन , जीवोत्पादन , शरीररक्षण , स्नायुतन्त्र इत्यादि। इन प्रणालियों के बिना ये साधन कार्य नहीं कर सकते। शरीर की तत्कालिक स्थिति के अनुसार ये सभी प्रणालियाँ मस्तिष्क के नियंत्रण में , आपस में संचार व समन्वय रखते हुये , चौबीसों घण्टे कार्य करती रहती हैं। इन सभी प्रणालियों को जो संस्थान चला रहा है वह प्राण है जो कि प्राणमय कोश मे स्थित है ; और , स्थूल शरीर के अन्नमय कोश से सूक्ष्मतर है। शरीर के विभिन्न कार्यक्षेत्रों के अनुसार प्राणमय कोश में पाँच प्राण हैं - प्राण , अपान , व्यान , समान , उदान और पाँच उपप्राण हैं - नाग , कूर्म , कृंकल , देवदत्त , धनञ्जय

आत्मा के ज्ञान और कर्म के लिये साधनरूप

दस बाह्यकरण - पाँच ज्ञानेन्द्रियों व पाँच कर्मेन्द्रियों ; तथा ,

चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार

इनके व्यापार को सुचारु रूप से चलाने के लिये शरीर में अनेक अंतः प्रणालियाँ कार्य कर रही है जिसका साधारण मनुष्य को भान नहीं होता।

ये प्रणालियाँ हैं - श्वसन , रक्तसंचार , भोजनपाचन , मलोत्सर्जन , जीवोत्पादन , शरीररक्षण , स्नायुतन्त्र इत्यादि।

इन प्रणालियों के बिना ये साधन कार्य नहीं कर सकते।

शरीर की तत्कालिक स्थिति के अनुसार ये सभी प्रणालियाँ मस्तिष्क के नियंत्रण में , आपस में संचार व समन्वय रखते हुये , चौबीसों घण्टे कार्य करती रहती हैं।

इन सभी प्रणालियों को जो संस्थान चला रहा है वह प्राण है जो कि प्राणमय कोश मे स्थित है ; और , स्थूल शरीर के अन्नमय कोश से सूक्ष्मतर है।

शरीर के विभिन्न कार्यक्षेत्रों के अनुसार प्राणमय कोश में

पाँच प्राण हैं - प्राण , अपान , व्यान , समान , उदान और

पाँच उपप्राण हैं - नाग , कूर्म , कृंकल , देवदत्त , धनञ्जय

प्राण - जीवन का आधार शरीर में स्थित विभिन्न आंतर - प्रणालियों को चलाने हेतु परमावश्यक है - उन तक उनका भोजन व शुद्ध वायु - आक्सीजन का पहुँचना ; और , विषैले पदार्थॉं यथा कार्बनडाइआक्साइड का बाहर निकलना। श्वसन ( फेफड़े ) और रक्त - संचार ( हृदय ) प्रणाली द्वारा यह कार्य निरन्तर चलने वाली श्वास - प्रश्वास क्रिया से सम्पन्न होता है। यह तथ्य है कि यदि मानव मस्तिष्क को कुछ (2-3) मिनटों तक शुद्ध आक्सीजन युक्त प्राण वायु न मिले तो मस्तिष्क कार्य करना बन्द कर देगा। इससे विभिन्न प्रणालियों का आपसी तालमेल और उनका नियंत्रण समाप्त हो जाने से उसकी मृत्यु हो जासकती है । मस्तिष्क ( स्नायु ) प्रणाली ही अन्य सारी प्रणालियों का प्रेरक , नियामक और संचालक है। सामान्यतः मनुष्य जब तक श्वास - प्रश्वास लेता रहता है अर्थात् जब तक शरीर में प्राण रहता है , तभी तक जीवन रहता है। अतः यह कहा जा सकता है कि प्राणमय कोश को स्वस्थ रखना मनुष्य जीवन के लिये अति आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है ; और , प्राण ही जीवन का आधार है।

शरीर में स्थित विभिन्न आंतर - प्रणालियों को चलाने हेतु परमावश्यक है -

उन तक उनका भोजन व शुद्ध वायु - आक्सीजन का पहुँचना ; और ,

विषैले पदार्थॉं यथा कार्बनडाइआक्साइड का बाहर निकलना।

श्वसन ( फेफड़े ) और रक्त - संचार ( हृदय ) प्रणाली द्वारा यह कार्य निरन्तर चलने वाली श्वास - प्रश्वास क्रिया से सम्पन्न होता है।

यह तथ्य है कि यदि मानव मस्तिष्क को कुछ (2-3) मिनटों तक शुद्ध आक्सीजन युक्त प्राण वायु न मिले तो मस्तिष्क कार्य करना बन्द कर देगा।

इससे विभिन्न प्रणालियों का आपसी तालमेल और उनका नियंत्रण समाप्त हो जाने से उसकी मृत्यु हो जासकती है ।

मस्तिष्क ( स्नायु ) प्रणाली ही अन्य सारी प्रणालियों का प्रेरक , नियामक और संचालक है।

सामान्यतः मनुष्य जब तक श्वास - प्रश्वास लेता रहता है अर्थात् जब तक शरीर में प्राण रहता है , तभी तक जीवन रहता है।

अतः यह कहा जा सकता है कि प्राणमय कोश को स्वस्थ रखना मनुष्य जीवन के लिये अति आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है ; और , प्राण ही जीवन का आधार है।

प्राणायाम स्वरूप - तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोः गति विच्छेदः प्राणायामः ॥ योगशास्त्र [2/49] श्वास - प्रश्वास में - सांस के लेने - छोड़ने में सामान्य क्रम और गति को रोक देना अथवा अंतर डाल देना प्राणायाम कहा जाता है। उद्देश्य - प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य॥ योगशास्त्र [1/34] प्राणमय कोश को स्वस्थ रखने के लिये और चित्त की एकाग्रता के लिये जो क्रिया अपनायी जाती है वह प्राणायाम है। चार भेद - बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः॥ योगशास्त्र [ 2/50] बाह्याभ्यंतरविषयाक्षेपी चतुर्थः॥ योगशास्त्र [2/51] 1. बाह्यवृत्ति - रेचक - वायु को बाहर निकालना ; 2. आभ्यंतरवृत्ति - पूरक - वायु को अन्दर लेना ; 3. स्तम्भवृत्ति - कुम्भक - वायु को जहाँ का तहाँ रोक देना ; 4. ' शुद्ध कुम्भक ' अथवा ' केवल कुम्भक ' जो बाह्य और आभ्यंतर को दूर रखता है , । . परिमाण - देश , काल और संख्या द्वारा नापे जाने वाला दीर्घ और सूक्ष्म ( लम्बा व हल्का ) होता है।

स्वरूप -

तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोः गति विच्छेदः प्राणायामः ॥ योगशास्त्र [2/49]

उद्देश्य -

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य॥ योगशास्त्र [1/34]

चार भेद -

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः॥ योगशास्त्र [ 2/50]

बाह्याभ्यंतरविषयाक्षेपी चतुर्थः॥ योगशास्त्र [2/51]

परिमाण - देश , काल और संख्या द्वारा नापे जाने वाला दीर्घ और सूक्ष्म ( लम्बा व हल्का ) होता है।

प्राणायाम के अनुष्ठान का फल दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः। तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥ मनुस्मृति [6/71] जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धातुओं का मल नष्ट होकर वे शुद्ध होते हैं , वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर इन्द्रियाँ निर्मल हो जाती हैं। योगांगानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ योगशास्त्र [2/28] जब मनुष्य योगांगों ( प्राणायाम ) को करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और आत्मा में ज्ञान का प्रकाश निरंतर बढ़ता जाता है , जब तक कि विवेकख्याति ( होकर मुक्ति ) न हो जाय। ततः क्षीयन्ते प्रकाशावरणम् ॥ योगशास्त्र [2/52] प्राणायाम के निरंतर अभ्यास व अनुष्ठान से प्रकाश ( आत्मसाक्षात्कार रूप विवेकज्ञान का ] का परदा दुर्बल व शिथिल हो जाता है। धारणासु च योग्यता मनसः ॥ योगशास्त्र [2/53] प्राणायाम के अभ्यास से धारणा आदि योगांगों के सुविधापूर्वक अनुष्ठान में मन की क्षमता उभर आती है।

दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।

योगांगानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ योगशास्त्र [2/28]

ततः क्षीयन्ते प्रकाशावरणम् ॥ योगशास्त्र [2/52]

धारणासु च योग्यता मनसः ॥ योगशास्त्र [2/53]

समाधि हेतु प्राणायाम

मोक्ष - मुक्ति मानव जीवन का परम लक्ष्य अपवर्ग अथवा मोक्ष की प्राप्ति है। . ' मुञ्चन्ति पृथग्भवन्ति जना यस्यां सा मुक्तिः ' वह अवस्था जिसमें जीव सभी प्रकार के दु : खों और बन्धनों से छूटकर आनन्द को प्राप्त करते हैं - मोक्ष अथवा मुक्ति है । जीव का बन्धन में पड़ने का कारण अविद्या है। जो दुष्ट अर्थात् विपरीत ज्ञान है उसको अविद्या कहते हैं। इन्द्रियों और संस्कार के दोष से अविद्या उत्पन्न होती है। जो अदुष्ट अर्थात् यथार्थ ज्ञान है उसको विद्या कहते हैं। संसार में जीव सुख और दुःख से सदा ग्रस्त रहता है , क्योंकि शरीर सहित जीव की सांसारिक प्रसन्नता सदा नहीं रहती , उसकी निवृत्ति होती ही है | जो शरीररहित मुक्त जीवात्मा ब्रह्म में रहता है उसको सांसारिक सुख - दुःख का स्पर्श भी नहीं होता , किन्तु वह सदा आनन्द में रहता है।

मानव जीवन का परम लक्ष्य अपवर्ग अथवा मोक्ष की प्राप्ति है। .

' मुञ्चन्ति पृथग्भवन्ति जना यस्यां सा मुक्तिः '

जीव का बन्धन में पड़ने का कारण अविद्या है।

जो दुष्ट अर्थात् विपरीत ज्ञान है उसको अविद्या कहते हैं।

इन्द्रियों और संस्कार के दोष से अविद्या उत्पन्न होती है।

जो अदुष्ट अर्थात् यथार्थ ज्ञान है उसको विद्या कहते हैं।

संसार में जीव सुख और दुःख से सदा ग्रस्त रहता है , क्योंकि शरीर सहित जीव की सांसारिक प्रसन्नता सदा नहीं रहती , उसकी निवृत्ति होती ही है |

जो शरीररहित मुक्त जीवात्मा ब्रह्म में रहता है उसको सांसारिक सुख - दुःख का स्पर्श भी नहीं होता , किन्तु वह सदा आनन्द में रहता है।

मुक्ति का स्वरूप मुक्ति में जीव का लय अथवा नाश नहीं होता। जो ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है , उसी में मुक्त जीव अव्याहतगति अर्थात् उसको कहीं कोई रुकावट नहीं ; विज्ञान व आनन्दपूर्वक स्वतन्त्र विचरता है। मोक्ष में भौतिक शरीर या इन्द्रियों के गोलक जीवात्माओं के साथ नहीं रहते , किंतु उसके अपने स्वाभाविक शुद्ध गुण और सामर्थ्य रहते हैं। जैसे शरीर के आधार रहकर इन्द्रियों के गोलक द्वारा जीव स्वकार्य करता है , वैसे अपनी शक्ति से मुक्ति में जीव सब आनन्द भोग लेता है। जीव में मुख्य एक प्रकार की शक्ति है , परंतु उसमें निम्न चौबीस प्रकार के सामर्थ्य हैं जिनसे जीव मुक्ति में भी आनन्द का भोग करता है - बल , पराक्रम , आकर्षण , प्रेरणा , गति , भीषण , विवेचन , क्रिया , उत्साह , स्मरण , निश्चय , इच्छा , प्रेम , द्वेष , संयोग , विभाग , संयोजक , विभाजक , श्रवण , स्पर्शन , दर्शन , स्वादन , गन्धग्रहण और ज्ञान ।

मुक्ति में जीव का लय अथवा नाश नहीं होता। जो ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है , उसी में मुक्त जीव अव्याहतगति अर्थात् उसको कहीं कोई रुकावट नहीं ; विज्ञान व आनन्दपूर्वक स्वतन्त्र विचरता है।

मोक्ष मे

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