समाधि पाद

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Information about समाधि पाद
Spiritual

Published on February 19, 2009

Author: Sanjayakumar

Source: slideshare.net

* योग दर्शन * योगविद्या का निरूपण करनेवाले प्रयोगात्मक शास्त्र का उपदेश * पतञ्जलि मुनि

ओ३म् योग दर्शन * विद्याभास्कर - वेदरत्न आचार्य उदयवीर शास्त्री द्वारा रचित पातञ्जल - योगदर्शनम् पर आधारित प्रस्तुतीकरण * प्रस्तुतकर्ता - सञ्जय कुमार

पतञ्जलि मुनि का काल पातञ्जल चतुष्पादात्मक योगदर्शन के उपलब्ध व्याख्या ग्रन्थों में सर्वाधिक प्राचीन प्रसिद्ध व्यासभाष्य है। * महाभारत तथा ब्रह्मसूत्रों ( वेदांतदर्शन ) के रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ही योगसूत्रों के भाष्यकार व्यास हैं। * वेदव्यास का प्रादुर्भावकाल अब से लगभग पाँच सहस्र वर्ष से भी अधिक पूर्व है। * योगसूत्रकार पतञ्जलि मुनि महाभारतयुद्धकालिक वेदव्यास से पूर्ववर्ती आचार्य हैं।

शास्त्र का उपक्रम प्रकृति और पुरुष के भेद का साक्षात्कार होना सांख्यदर्शन में मोक्ष का साधन बताया गया है। इसी का नाम प्रकृतिपुरुषविवेक है। साधारण लोकव्यवहार में सुबुद्ध व्यक्ति भी जड़ देह को चेतन आत्मा समझता रहता है। यह मोह अथवा अज्ञान की स्थिति है। जड़ और चेतन के भेद को शाब्दिक रूप में जानलेना विवेक - ज्ञान नहीं है। इनके भेद का साक्षात्कार ज्ञान , विवेकज्ञान अथवा विवेकख्याति कहाजाता है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिये जो साधन अपेक्षित हैं , उनका विवरण प्रस्तुत करने के लिये इस शास्त्र का उपक्रम है।

प्रकृति और पुरुष के भेद का साक्षात्कार होना सांख्यदर्शन में मोक्ष का साधन बताया गया है। इसी का नाम प्रकृतिपुरुषविवेक है।

साधारण लोकव्यवहार में सुबुद्ध व्यक्ति भी जड़ देह को चेतन आत्मा समझता रहता है। यह मोह अथवा अज्ञान की स्थिति है।

जड़ और चेतन के भेद को शाब्दिक रूप में जानलेना विवेक - ज्ञान नहीं है। इनके भेद का साक्षात्कार ज्ञान , विवेकज्ञान अथवा विवेकख्याति कहाजाता है।

इस अवस्था को प्राप्त करने के लिये जो साधन अपेक्षित हैं , उनका विवरण प्रस्तुत करने के लिये इस शास्त्र का उपक्रम है।

पातञ्जल - योगदर्शनम् तत्र समाधिपादः प्रथमः *** प्रस्तुतकर्ता - सञ्जय कुमार

समाधिपाद प्रथम पाद में समाधि का पूर्ण विवरण होने से इसका नाम समाधिपाद है।

समाधिपाद में प्रतिपाद्य विषय (1) प्रतिपाद्य विषय सूत्र संख्या शास्त्र का प्रारम्भ , समाधि का स्वरूप , एवं समाधि अवस्था व्युत्थान दशा , प्रमाण आदि पाँच प्रकार की वृत्तियों का विवरण वृत्तियों के निरोध का उपाय - अभ्यास और वैराग्य संप्रज्ञात , असम्प्रज्ञात समाधि का स्वरूप ; समाधिलाभ शीघ्र कैसे समाधिलाभ का अन्य उपाय - ईश्वरप्रणिधान , तथा ईश्वरप्रणिधान का फल - आत्मज्ञान एवं योगमार्ग में विघ्न - बाधाओं का अभाव। अंतराय ( विघ्न ) और उनका निवाराण चित्त को प्रसन्न , विमल , निर्दोष रखने के उपाय सम्प्रज्ञात समाधि ( समापत्ति ) और उसके भेद समापत्ति का फल असम्प्रज्ञात समाधि 1-3 4-11 12-16 17-22 23-29 30-32 33-40 41-46 47-50 51

शास्त्र का प्रारम्भ , समाधि का स्वरूप , एवं समाधि अवस्था

व्युत्थान दशा , प्रमाण आदि पाँच प्रकार की वृत्तियों का विवरण

वृत्तियों के निरोध का उपाय - अभ्यास और वैराग्य

संप्रज्ञात , असम्प्रज्ञात समाधि का स्वरूप ; समाधिलाभ शीघ्र कैसे

समाधिलाभ का अन्य उपाय - ईश्वरप्रणिधान , तथा ईश्वरप्रणिधान का फल - आत्मज्ञान एवं योगमार्ग में विघ्न - बाधाओं का अभाव।

अंतराय ( विघ्न ) और उनका निवाराण

चित्त को प्रसन्न , विमल , निर्दोष रखने के उपाय

सम्प्रज्ञात समाधि ( समापत्ति ) और उसके भेद

समापत्ति का फल

असम्प्रज्ञात समाधि

अथ योगानुशासनम् ॥ 1/1 ॥ अब प्रारम्भ किया जाता है , योग एवं योगशास्त्र का उपदेश । प्रकृति - पुरुष के भेद ( आत्मज्ञान ) की जिज्ञासा के लिए उत्सुक , जितेन्द्रिय जनों के कल्याण की अभिलाषा से , पतञ्जलि मुनि ने योग ( समाधि ) शास्त्र के उपदेश का आरम्भ किया ॥ प्रस्तुत सूत्र में योग शब्द का अर्थ ' समाधि ' है। योग की यह परम्परा आदि सर्ग से चालू रही है। योग की इस पद्धति का उपदेश पतञ्जलि मुनि की अपनी कल्पना नहीं , प्रत्युत यह पद्धति अतिप्राचीन और वेदमूलक है। कालांतर में लोगों के आलस्य प्रमाद आदि के कारण समय - समय पर इस विद्या के नष्ट होने अथवा इसमें शैथिल्य आने का उल्लेख भारतीय साहित्य में मिलता है। ऐसे ही किसी प्राचीन काल में , लोकानुग्रह की अभिलाषा से पतञ्जलि मुनि ने , योग पद्धति का ' अनुशासन ' अर्थात् पुनः उद्धार कर उपदेश किया ; और , उस सबको व्यवस्थित कर के सूत्रबद्ध रूप में प्रस्तुत किया ।

प्रकृति - पुरुष के भेद ( आत्मज्ञान ) की जिज्ञासा के लिए उत्सुक , जितेन्द्रिय जनों के कल्याण की अभिलाषा से , पतञ्जलि मुनि ने योग ( समाधि ) शास्त्र के उपदेश का आरम्भ किया ॥

प्रस्तुत सूत्र में योग शब्द का अर्थ ' समाधि ' है। योग की यह परम्परा आदि सर्ग से चालू रही है।

योग की इस पद्धति का उपदेश पतञ्जलि मुनि की अपनी कल्पना नहीं , प्रत्युत यह पद्धति अतिप्राचीन और वेदमूलक है।

कालांतर में लोगों के आलस्य प्रमाद आदि के कारण समय - समय पर इस विद्या के नष्ट होने अथवा इसमें शैथिल्य आने का उल्लेख भारतीय साहित्य में मिलता है।

ऐसे ही किसी प्राचीन काल में , लोकानुग्रह की अभिलाषा से पतञ्जलि मुनि ने , योग पद्धति का ' अनुशासन ' अर्थात् पुनः उद्धार कर उपदेश किया ; और , उस सबको व्यवस्थित कर के सूत्रबद्ध रूप में प्रस्तुत किया ।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ 1/ 2 ॥ योग है : चित्त की वृत्तियों का निरोध अर्थात् रोकना । सांख्य दर्शन में जिस अंत : करण को महत्तत्त्व , अथवा बुद्धि के नाम से कहा गया है , योग ने उसी को चित्त नाम दिया है। अर्थ - ज्ञान के निश्चय कराने में साधन होने के अतिरिक्त , बुद्धितत्त्व का - योगप्रक्रिया के अनुसार - एक विशिष्ट कार्य है - अर्थतत्त्व का चिंतन। प्रस्तुत शास्त्र में अर्थतत्त्व से तात्पर्य परमात्मतत्त्व का है। साक्षात्कार के लिये प्रणव [ ओ३म् ] जप आदि के द्वारा ईश्वर का चिंतन अर्थात् निरंतर स्मरण करने का उपपादन इस दर्शन का प्रधान उद्देश्य है , और यह चिंतन बुद्धि द्वारा होता है। इस दर्शन में बुद्धितत्त्व को चित्त पद से अभिव्यक्त किया गया है। यह चिंतन का प्रधान साधन है। इसीलिये योगसूत्रों में प्रायः चित्त पद का प्रयोग हुआ है।

सांख्य दर्शन में जिस अंत : करण को महत्तत्त्व , अथवा बुद्धि के नाम से कहा गया है , योग ने उसी को चित्त नाम दिया है।

अर्थ - ज्ञान के निश्चय कराने में साधन होने के अतिरिक्त , बुद्धितत्त्व का - योगप्रक्रिया के अनुसार - एक विशिष्ट कार्य है - अर्थतत्त्व का चिंतन।

प्रस्तुत शास्त्र में अर्थतत्त्व से तात्पर्य परमात्मतत्त्व का है।

साक्षात्कार के लिये प्रणव [ ओ३म् ] जप आदि के द्वारा ईश्वर का चिंतन अर्थात् निरंतर स्मरण करने का उपपादन इस दर्शन का प्रधान उद्देश्य है , और यह चिंतन बुद्धि द्वारा होता है।

इस दर्शन में बुद्धितत्त्व को चित्त पद से अभिव्यक्त किया गया है। यह चिंतन का प्रधान साधन है।

इसीलिये योगसूत्रों में प्रायः चित्त पद का प्रयोग हुआ है।

चित्त एवं चित्तवृत्ति अंतःकरण अथवा चित्त की स्थिति मानव - मस्तिष्क में है । सांख्य - योग की मान्यताओं के अनुसार समस्त जड़ जगत् तीन गुणों - सत्त्व , रजस् , तमस् - का परिणाम है। दृश्य - अदृश्य विश्व के मूल उपादान कारण ये ही तीन गुण हैं , चित्त भी इनका परिणाम है। इनमें सत्त्व - प्रकाश स्वभाव , रजस् - प्रवृत्ति स्वभाव तथा तमस् - नियमन [ रोकना ] स्वभाव रहता है। वस्तु में जब जिस गुण का उद्रेक [ प्राधान्य ] रहता है , तब वही स्वभाव प्रकट में आता है। चित्त की रचना सत्त्वगुण - प्रधान है , इसकारण रजस् - तमस् के उद्रेक में भी चित्त का प्रकाश स्वभाव निरन्तर बना रहता है। इन्हीं तीन गुणों के यथायथ प्रधान व अप्रधान रहने से चित्त की विभिन्न अवस्थाएं व वृत्तियाँ प्रकट में आती हैं। चित्त सदा ही किसी न किसी वृत्ति से अभिभूत रहता है। वृत्ति व्यापार को कहते हैं। चक्षु आदि इन्द्रियों का अपने विषय - रूप आदि के साथ सम्बन्ध होना व्यापार है। बाह्यकरण चक्षु आदि का जो व्यापार है , वही व्यापार अंतःकरण चित्त का रहता है। चित्त की वृत्ति अर्थात् व्यापार ( मुख्य कार्य ) का स्वरूप है - ' बाह्य विषयों को बाह्य इन्द्रियों से लेकर द्रष्टा ( आत्मा ) तक पहुँचाना ' ।

अंतःकरण अथवा चित्त की स्थिति मानव - मस्तिष्क में है ।

सांख्य - योग की मान्यताओं के अनुसार समस्त जड़ जगत् तीन गुणों - सत्त्व , रजस् , तमस् - का परिणाम है। दृश्य - अदृश्य विश्व के मूल उपादान कारण ये ही तीन गुण हैं , चित्त भी इनका परिणाम है। इनमें सत्त्व - प्रकाश स्वभाव , रजस् - प्रवृत्ति स्वभाव तथा तमस् - नियमन [ रोकना ] स्वभाव रहता है।

वस्तु में जब जिस गुण का उद्रेक [ प्राधान्य ] रहता है , तब वही स्वभाव प्रकट में आता है। चित्त की रचना सत्त्वगुण - प्रधान है , इसकारण रजस् - तमस् के उद्रेक में भी चित्त का प्रकाश स्वभाव निरन्तर बना रहता है।

इन्हीं तीन गुणों के यथायथ प्रधान व अप्रधान रहने से चित्त की विभिन्न अवस्थाएं व वृत्तियाँ प्रकट में आती हैं।

चित्त सदा ही किसी न किसी वृत्ति से अभिभूत रहता है। वृत्ति व्यापार को कहते हैं। चक्षु आदि इन्द्रियों का अपने विषय - रूप आदि के साथ सम्बन्ध होना व्यापार है।

बाह्यकरण चक्षु आदि का जो व्यापार है , वही व्यापार अंतःकरण चित्त का रहता है।

चित्त की वृत्ति अर्थात् व्यापार ( मुख्य कार्य ) का स्वरूप है - ' बाह्य विषयों को बाह्य इन्द्रियों से लेकर द्रष्टा ( आत्मा ) तक पहुँचाना ' ।

चित्तवृत्ति - निरोध निरोध का अर्थ है - रोकना। इसका तात्पर्य किसी प्रतिबन्ध को सामने खड़ा करना नहीं है ; प्रत्युत विषयों का चिंतन एवं उनमें आसक्तिपूर्वक प्रवृत्ति का न होना ही निरोध का स्वरूप है। चित्त की वृत्तियों का निरोध योग का स्वरूप है। ऐसी अवस्था जिन उपायों से प्राप्त होती है , उनका निरूपण करना इस शास्त्र का मुख्य लक्ष्य है। अपनी साधारण दशा में बाह्य विषयों के ग्रहण के लिये मानव - चित्त बाह्य करणों का दास रहता है। किंतु जब मानव योगविधियों द्वारा चित्त को निरुद्ध कर समाधि की अवस्था को प्राप्त कर लेता है ; तब वह बाह्य विषयों के ज्ञान के लिये इन्द्रियों से बँधा नहीं रहता। उस दशा में वह बाह्य इन्द्रियों के सहयोग के विना केवल चित्त - अंतःकरण द्वारा बाह्य विषयों के ग्रहण में समर्थ होता है। चित्त - वृत्ति निरोध के लिये हमे सर्वप्रथम चित्त की विभिन्न अवस्थाओं का स्वरूप समझना चाहिये।

निरोध का अर्थ है - रोकना।

इसका तात्पर्य किसी प्रतिबन्ध को सामने खड़ा करना नहीं है ; प्रत्युत विषयों का चिंतन एवं उनमें आसक्तिपूर्वक प्रवृत्ति का न होना ही निरोध का स्वरूप है।

चित्त की वृत्तियों का निरोध योग का स्वरूप है। ऐसी अवस्था जिन उपायों से प्राप्त होती है , उनका निरूपण करना इस शास्त्र का मुख्य लक्ष्य है।

अपनी साधारण दशा में बाह्य विषयों के ग्रहण के लिये मानव - चित्त बाह्य करणों का दास रहता है।

किंतु जब मानव योगविधियों द्वारा चित्त को निरुद्ध कर समाधि की अवस्था को प्राप्त कर लेता है ; तब वह बाह्य विषयों के ज्ञान के लिये इन्द्रियों से बँधा नहीं रहता।

उस दशा में वह बाह्य इन्द्रियों के सहयोग के विना केवल चित्त - अंतःकरण द्वारा बाह्य विषयों के ग्रहण में समर्थ होता है।

चित्त - वृत्ति निरोध के लिये हमे सर्वप्रथम चित्त की विभिन्न अवस्थाओं का स्वरूप समझना चाहिये।

चित्त की अवस्थाएँ साधारण ( व्युत्थान ) दशा में चित्त की तीन अवस्थाएँ हो सकती हैं। क्षिप्त - रजस् का प्राबल्य होने से चित्त चञ्चल , विचलित और डांवाडोल बना रहता है । निर्णय करने में असमर्थ रहता है । रजोगुण चित्त को इधर - उधर फेंके रखता है । मूढ - रजस् का वेग कम होकर तमस् का प्राधान्य होता है । वह मोह - आवरण को उभार देता है। अज्ञान , अधर्म , अनैश्वर्य का साधन बनता है। निद्रा , आलस्य , अधार्मिक कार्य इसी के परिणाम हैं। विक्षिप्त - क्षिप्त से विपरीत इस अवस्था में स्थिरता की ओर प्रवृत्ति रहती है। तमोगुण , रजोगुण क्षीण होने और सत्त्व का उद्रेक होने से ज्ञान , धर्म , वैराग्य , ऐश्वर्य आदि की ओर प्रवृत्ति में साधन होता है। चित्त की उपर्युक्त ये तीनों अवस्थाएं योग की सीमा में नहीं आतीं। योगानुष्ठान के परिणामस्वरूप चित्त की दो अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं - एकाग्र अवस्था और निरुद्ध अवस्था

साधारण ( व्युत्थान ) दशा में चित्त की तीन अवस्थाएँ हो सकती हैं।

क्षिप्त - रजस् का प्राबल्य होने से चित्त चञ्चल , विचलित और डांवाडोल बना रहता है । निर्णय करने में असमर्थ रहता है । रजोगुण चित्त को इधर - उधर फेंके रखता है ।

मूढ - रजस् का वेग कम होकर तमस् का प्राधान्य होता है । वह मोह - आवरण को उभार देता है। अज्ञान , अधर्म , अनैश्वर्य का साधन बनता है। निद्रा , आलस्य , अधार्मिक कार्य इसी के परिणाम हैं।

विक्षिप्त - क्षिप्त से विपरीत इस अवस्था में स्थिरता की ओर प्रवृत्ति रहती है। तमोगुण , रजोगुण क्षीण होने और सत्त्व का उद्रेक होने से ज्ञान , धर्म , वैराग्य , ऐश्वर्य आदि की ओर प्रवृत्ति में साधन होता है।

चित्त की उपर्युक्त ये तीनों अवस्थाएं योग की सीमा में नहीं आतीं।

योगानुष्ठान के परिणामस्वरूप चित्त की दो अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं -

एकाग्र अवस्था और

निरुद्ध अवस्था

चित्त की एकाग्र - अवस्था चित्त में रजोगुण - तमोगुण का आंशिक भी उद्रेक नहीं रहता। चित्त बाह्य विषयों की ओर प्रवृत्त न होकर एकमात्र आध्यात्म चिंतन में निरत रहता है। पूर्वानुभूत विषयों के संस्कार , बीज रूप में , अवश्य बने रहते हैं , जो आकस्मिक रूप से उद्बुद्ध हो कर एकाग्र अवस्था में यदा - कदा विघ्न अवश्य उपस्थित करते रहते हैं। योगी निश्चल व एकाग्र होकर , स्थूल , सूक्ष्म , सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम ( अतीन्द्रिय ) तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप को साक्षात् करने में समर्थ होता है। योगी प्रकृति - पुरुष ( आत्मा और चित्त ) के भेद का साक्षात्कार कर लेता है। इसी का नाम विवेकख्याति है। इस अवस्था को योग में संप्रज्ञात योग अथवा सम्प्रज्ञात समाधि या सबीज समाधि भी कहते हैं। त्रिगुण ( सत् , रजस् , तमस् ) का परिणाम होने से चित्त की एकाग्र अवस्था एक अस्थायी अवस्था है ।

चित्त में रजोगुण - तमोगुण का आंशिक भी उद्रेक नहीं रहता।

चित्त बाह्य विषयों की ओर प्रवृत्त न होकर एकमात्र आध्यात्म चिंतन में निरत रहता है।

पूर्वानुभूत विषयों के संस्कार , बीज रूप में , अवश्य बने रहते हैं , जो आकस्मिक रूप से उद्बुद्ध हो कर एकाग्र अवस्था में यदा - कदा विघ्न अवश्य उपस्थित करते रहते हैं।

योगी निश्चल व एकाग्र होकर , स्थूल , सूक्ष्म , सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम ( अतीन्द्रिय ) तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप को साक्षात् करने में समर्थ होता है।

योगी प्रकृति - पुरुष ( आत्मा और चित्त ) के भेद का साक्षात्कार कर लेता है। इसी का नाम विवेकख्याति है।

इस अवस्था को योग में संप्रज्ञात योग अथवा सम्प्रज्ञात समाधि या सबीज समाधि भी कहते हैं।

त्रिगुण ( सत् , रजस् , तमस् ) का परिणाम होने से चित्त की एकाग्र अवस्था एक अस्थायी अवस्था है ।

चित्त की निरुद्ध - अवस्था ' चित्त की एकाग्र अवस्था का भी अंत हो जाता है ; और , विवेकख्याति निरंतर नहीं बनी रह सकती ' - ऐसा बोध होने पर योगी में विवेकख्याति की ओर से भी वैराग्य की भावना जागृत हो जाती है। यह चित्त की निरुद्ध अवस्था है। संस्कारों के विद्यमान रहते हुए भी इस अवस्था में चित्त उनको उद्बुद्ध करने में अक्षम रहता है। इस अवस्था में कर्माशय दग्ध होजाते हैं - जिससे उनका बीज भाव अंतर्हित हो जाता है। इसी कारण इस अवस्था को निर्बीज समाधि कहा जाता है। कर्माशय सुख - दुःख आदि के वे बीज ( संस्कार - समूह ) हैं , जो जन्म , आयु और भोग के रूप में प्राणी को प्राप्त होते रहते हैं। आत्मबोध के अतिरिक्त अन्य किसी विषय का किसी प्रकार का ज्ञान न होने से योगियों के सम्प्रदाय में इस अवस्था का नाम असम्प्रज्ञात समाधि है।

' चित्त की एकाग्र अवस्था का भी अंत हो जाता है ; और , विवेकख्याति निरंतर नहीं बनी रह सकती ' - ऐसा बोध होने पर योगी में विवेकख्याति की ओर से भी वैराग्य की भावना जागृत हो जाती है। यह चित्त की निरुद्ध अवस्था है।

संस्कारों के विद्यमान रहते हुए भी इस अवस्था में चित्त उनको उद्बुद्ध करने में अक्षम रहता है।

इस अवस्था में कर्माशय दग्ध होजाते हैं - जिससे उनका बीज भाव अंतर्हित हो जाता है।

इसी कारण इस अवस्था को निर्बीज समाधि कहा जाता है।

कर्माशय सुख - दुःख आदि के वे बीज ( संस्कार - समूह ) हैं , जो जन्म , आयु और भोग के रूप में प्राणी को प्राप्त होते रहते हैं।

आत्मबोध के अतिरिक्त अन्य किसी विषय का किसी प्रकार का ज्ञान न होने से योगियों के सम्प्रदाय में इस अवस्था का नाम असम्प्रज्ञात समाधि है।

तदा द्रष्टु : स्वरूपे अवस्थानम् ॥ 1/ 3 ॥ उस समय ( चित्त की असम्प्रज्ञात समाधि अवस्था में ) सबके द्रष्टा परमात्मा के स्वरूप में ( जीवात्मा का ) ठहरना ( होता है ) । आत्मा का चैतन्य स्वरूप सदा बना रहता है , चाहे समाधि दशा हो अथवा व्युत्थान दशा। अनुभव करना आत्मा का स्वभाव है। व्युत्थान दशा में आत्मा द्वारा विषयों का अनुभव आत्मा के प्रकृति - सम्पर्क होने पर होता है। इस सम्पर्क का मुख्य एवं अंतिम ( निकटतम ) उपकरण बुद्धि अथवा चित्त है ; वह आत्मा के असम्प्रज्ञात समाधि अवस्था प्राप्त होने पर निष्क्रिय हो जाता है। फलतः निरुद्ध अवस्था में , जब चित्त निष्क्रिय हो चुका होता है , आत्मा केवल परमात्मा के आनन्दमय स्वरूप का अनुभव करता है। तब उसे द्रष्टा के स्वरूप में अवस्थित कहा जाता है। आत्मा इस अवस्था को प्राप्त करने पर अन्य समस्त विषयों से अछूता हो जाता है ; और , समाधिलब्ध शक्ति द्वारा परमात्मा के आनन्दरूप में निमग्न हो जाता है।

आत्मा का चैतन्य स्वरूप सदा बना रहता है , चाहे समाधि दशा हो अथवा व्युत्थान दशा। अनुभव करना आत्मा का स्वभाव है।

व्युत्थान दशा में आत्मा द्वारा विषयों का अनुभव आत्मा के प्रकृति - सम्पर्क होने पर होता है।

इस सम्पर्क का मुख्य एवं अंतिम ( निकटतम ) उपकरण बुद्धि अथवा चित्त है ; वह आत्मा के असम्प्रज्ञात समाधि अवस्था प्राप्त होने पर निष्क्रिय हो जाता है।

फलतः निरुद्ध अवस्था में , जब चित्त निष्क्रिय हो चुका होता है , आत्मा केवल परमात्मा के आनन्दमय स्वरूप का अनुभव करता है। तब उसे द्रष्टा के स्वरूप में अवस्थित कहा जाता है।

आत्मा इस अवस्था को प्राप्त करने पर अन्य समस्त विषयों से अछूता हो जाता है ; और , समाधिलब्ध शक्ति द्वारा परमात्मा के आनन्दरूप में निमग्न हो जाता है।

वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥ 1/ 4 ॥ वृत्तियों के समान रूपवाला ( प्रतीत होता है , आत्मा ) अन्य अवस्था में। { पूर्ण समाधि दशा से अन्य अर्थात् व्युत्थान दशा में } । समाधिकाल से अतिरिक्त काल में बाह्य इन्द्रियाँ विषयों से सम्बद्ध होकर , अंतःकरण के माध्ययम से , उन विषयों को आत्मा तक पहुँचाने में रत रहती हैं। बाह्य एवं अंतःकरण द्वारा जो विषय आत्मा के लिये प्रस्तुत किया जाता है ; आत्मा उसका ग्रहण करता है। उन बाह्य विषयों का बोध आत्मा को होता रहता है। यह बोध आत्मा की व्युत्थान दशा कही जाती है। आत्मा की वृत्तिसमानरूपता है - ' इन्द्रिय द्वारा जो व्यापार होरहा है , उसीके समान आत्मा को विषय का बोध होना ' । यह आत्मा के बाह्यवृत्ति होने की अवस्था है ; आंतरवृत्ति अथवा समाधि की नहीं।

समाधिकाल से अतिरिक्त काल में बाह्य इन्द्रियाँ विषयों से सम्बद्ध होकर , अंतःकरण के माध्ययम से , उन विषयों को आत्मा तक पहुँचाने में रत रहती हैं।

बाह्य एवं अंतःकरण द्वारा जो विषय आत्मा के लिये प्रस्तुत किया जाता है ; आत्मा उसका ग्रहण करता है।

उन बाह्य विषयों का बोध आत्मा को होता रहता है। यह बोध आत्मा की व्युत्थान दशा कही जाती है।

आत्मा की वृत्तिसमानरूपता है -

यह आत्मा के बाह्यवृत्ति होने की अवस्था है ; आंतरवृत्ति अथवा समाधि की नहीं।

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाः अक्लिष्टाः ॥ 1/ 5 ॥ वृत्तियाँ पाँच प्रकार ( वर्ग ) की हैं , जो क्लिष्ट ( दु : ख की उत्पादक ) और अक्लिष्ट ( दु : ख का विनाश करनेवाली ) हैं। वृत्तियाँ किसी भी वर्ग की हों , सत्त्व आदि गुण - प्रधानभाव से यथायथ दुःख और सुख - दोनों को उत्पन्न करनेवाली होती हैं। सूत्रकार ने आगे [2/ 3] अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश बताये हैं। अविद्या आदि क्लेश जिन वृत्तियों के हेतु हैं , वे वृत्तियाँ क्लिष्ट कही जाती हैं ; और , दुःख उत्पन्न करती हैं। जिन वृत्तियों का हेतु अविद्या आदि क्लेश नही हैं , प्रत्युत जो इन्द्रिय - वृत्तियाँ आध्यात्मिक भावनाओं से प्रेरणा पाकर उभरती हैं , वे अक्लिष्ट कही जाती हैं ; और , दुःख अदि को उत्पन्न करने के स्थान पर वे उनका नाश करने में सहयोगी होती हैं। अक्लिष्ट वृत्तियाँ अभ्यासी योगी को विवेक - ख्याति की ओर अग्रसर करती हैं ; एवं , उसे लक्ष्य तक पहुँचा देती हैं।

वृत्तियाँ किसी भी वर्ग की हों , सत्त्व आदि गुण - प्रधानभाव से यथायथ दुःख और सुख - दोनों को उत्पन्न करनेवाली होती हैं।

सूत्रकार ने आगे [2/ 3] अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश बताये हैं।

अविद्या आदि क्लेश जिन वृत्तियों के हेतु हैं , वे वृत्तियाँ क्लिष्ट कही जाती हैं ; और , दुःख उत्पन्न करती हैं।

जिन वृत्तियों का हेतु अविद्या आदि क्लेश नही हैं , प्रत्युत जो इन्द्रिय - वृत्तियाँ आध्यात्मिक भावनाओं से प्रेरणा पाकर उभरती हैं , वे अक्लिष्ट कही जाती हैं ; और , दुःख अदि को उत्पन्न करने के स्थान पर वे उनका नाश करने में सहयोगी होती हैं।

अक्लिष्ट वृत्तियाँ अभ्यासी योगी को विवेक - ख्याति की ओर अग्रसर करती हैं ; एवं , उसे लक्ष्य तक पहुँचा देती हैं।

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥ 1/ 6 ॥ प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा और स्मृति ( वृत्तियों के पाँच वर्ग हैं ) । किसी वस्तु या पदार्थ के अस्तित्त्व , उसके आकार - प्रकार , गुण - धर्म , रंग - रूप इत्यादि का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिये चित्त में जो व्यापार वा प्रक्रिया होती है वह प्रमाण प्रवृत्ति है। ज्ञानेन्द्रिय का उसके सामने स्थित विषय के साथ सम्बन्ध होने पर वह विषय अपने आकार - प्रकार सहित इन्द्रिय में प्रतिबिम्बित हो जाता है। इन्द्रिय के साथ मन का , मन के साथ अहंकार एवं अहंकार के साथ बुद्धि का सम्बन्ध होने से वह विषय - प्रतिबिम्ब बुद्धि में प्रतिफलित होता है। बुद्धि का सीधा सम्बन्ध आत्मा के साथ होने से आत्मा को उस विषय का बोध होता है।

किसी वस्तु या पदार्थ के अस्तित्त्व , उसके आकार - प्रकार , गुण - धर्म , रंग - रूप इत्यादि का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिये चित्त में जो व्यापार वा प्रक्रिया होती है वह प्रमाण प्रवृत्ति है।

ज्ञानेन्द्रिय का उसके सामने स्थित विषय के साथ सम्बन्ध होने पर वह विषय अपने आकार - प्रकार सहित इन्द्रिय में प्रतिबिम्बित हो जाता है।

इन्द्रिय के साथ मन का , मन के साथ अहंकार एवं अहंकार के साथ बुद्धि का सम्बन्ध होने से वह विषय - प्रतिबिम्ब बुद्धि में प्रतिफलित होता है।

बुद्धि का सीधा सम्बन्ध आत्मा के साथ होने से आत्मा को उस विषय का बोध होता है।

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ 1/ 7 ॥ प्रत्यक्ष , अनुमान और आगम - ये प्रमाण ( नामक वृत्ति के वर्ग में ) हैं। प्रत्यक्ष - चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों से पदार्थ या विषयों का ' विशेष ' ( आकार - प्रकार सहित गुण - धर्म , रंग - रूप , गंध - स्वाद आदि का सम्पूर्ण ) यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने की चित्तवृत्ति प्रत्यक्ष प्रमाण है। अनुमान - किसी पदार्थ के किसी एक गुण अथवा धर्म को ज्ञात कर उस पदार्थ वा उसके समान धर्मी पदार्थ की स्थिति एवं धर्मज्ञात कर लेना अनुमान वृत्ति है। इस वृत्ति में भी पदार्थ का यथार्थज्ञान होता है ; किंतु केवल ' सामान्य ' ( सद्भाव मात्र ) ज्ञान ही , ' विशेष ' नहीं। जैसे धुएँ को देख कर अग्नि की उपस्थिति का अनुमान। आगम - जब कोई आप्त ( वस्तु के गुण - धर्म का यथार्थ ज्ञाता ) व्यक्ति , अन्य व्यक्ति को बोध कराने की भावना से , कथन करता है तब वक्ता के कथन से उस वस्तु के सम्बन्ध में ' सामान्य ' ज्ञान प्राप्त करने की चित्त वृत्ति आगम या शब्द प्रमाण कहलाती है।

प्रत्यक्ष -

चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों से पदार्थ या विषयों का ' विशेष ' ( आकार - प्रकार सहित गुण - धर्म , रंग - रूप , गंध - स्वाद आदि का सम्पूर्ण ) यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने की चित्तवृत्ति प्रत्यक्ष प्रमाण है।

अनुमान -

किसी पदार्थ के किसी एक गुण अथवा धर्म को ज्ञात कर उस पदार्थ वा उसके समान धर्मी पदार्थ की स्थिति एवं धर्मज्ञात कर लेना अनुमान वृत्ति है।

इस वृत्ति में भी पदार्थ का यथार्थज्ञान होता है ; किंतु केवल ' सामान्य ' ( सद्भाव मात्र ) ज्ञान ही , ' विशेष ' नहीं। जैसे धुएँ को देख कर अग्नि की उपस्थिति का अनुमान।

आगम -

जब कोई आप्त ( वस्तु के गुण - धर्म का यथार्थ ज्ञाता ) व्यक्ति , अन्य व्यक्ति को बोध कराने की भावना से , कथन करता है तब वक्ता के कथन से उस वस्तु के सम्बन्ध में ' सामान्य ' ज्ञान प्राप्त करने की चित्त वृत्ति आगम या शब्द प्रमाण कहलाती है।

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ 1/ 8 ॥ विपर्यय है मिथ्याज्ञान , जो उसके ( वस्तुतत्त्व के ) रूप में प्रतिष्ठित नहीं होता । मिथ्याज्ञान को उत्पन्न करने वाली चित्त की प्रवृत्ति को विपर्यय कहते हैं। मिथ्याज्ञान और यथार्थज्ञान दोनों का साधन एक होता है ; किंतु , साधन , विषय एवं संस्कारगत दोषों के कारण वस्तु तत्त्व यथार्थ से भिन्न रूप में प्रतीत होता है। संशयात्मक चित्तवृत्ति को विपर्यय के अंतर्गत समझना चाहिये क्योंकि इसमें वस्तु का यथार्थ ज्ञान नहीं होता। विपर्यय अथवा मिथ्याज्ञान का अन्य एक नाम अविद्या है। इस चित्तवृत्ति को सब अनर्थों का मूल माना गया है। इस विपर्यय अर्थात् मिथ्याज्ञान का नाश तत्त्वज्ञान के उदय होजाने पर होता है।

मिथ्याज्ञान को उत्पन्न करने वाली चित्त की प्रवृत्ति को विपर्यय कहते हैं।

मिथ्याज्ञान और यथार्थज्ञान दोनों का साधन एक होता है ; किंतु , साधन , विषय एवं संस्कारगत दोषों के कारण वस्तु तत्त्व यथार्थ से भिन्न रूप में प्रतीत होता है।

संशयात्मक चित्तवृत्ति को विपर्यय के अंतर्गत समझना चाहिये क्योंकि इसमें वस्तु का यथार्थ ज्ञान नहीं होता।

विपर्यय अथवा मिथ्याज्ञान का अन्य एक नाम अविद्या है।

इस चित्तवृत्ति को सब अनर्थों का मूल माना गया है।

इस विपर्यय अर्थात् मिथ्याज्ञान का नाश तत्त्वज्ञान के उदय होजाने पर होता है।

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥ 1/9 ॥ शब्द और शब्दज्ञान के अनुसार उभरनेवाली चित्तवृत्ति का नाम - यदि वह विषयगत वस्तु से शून्य हो , तो - विकल्प है । किसी शब्द के उच्चारण और उससे होनेवाले शाब्दज्ञान के अनुसार उसके प्रभाव से सुनने वाले व्यक्ति के चित्त में ऐसे विषय का ज्ञान हो जो वस्तु ( यथार्थ ) स्थिति से शून्य ( उलटी ) हो तो उस उभारनेवाली चित्त - वृत्ति को विकल्प कहते हैं। विकल्पवृत्ति यथार्थ ज्ञान नहीं है क्योंकि यहाँ वृत्ति से ज्ञात वस्तु का सर्वथा अभाव होता है , जबकि प्रमाणवृत्ति में सर्वत्र विषय - वस्तु का सद्भाव रहता है। अभिन्न वस्तुओं में भेद और भिन्न वस्तुओं में अभेद की कल्पना कर शब्दों का प्रयोग कर अभिव्यक्ति करना ही विकल्प वृत्ति का आधार है।

किसी शब्द के उच्चारण और उससे होनेवाले शाब्दज्ञान के अनुसार उसके प्रभाव से सुनने वाले व्यक्ति के चित्त में ऐसे विषय का ज्ञान हो जो वस्तु ( यथार्थ ) स्थिति से शून्य ( उलटी ) हो तो उस उभारनेवाली चित्त - वृत्ति को विकल्प कहते हैं।

विकल्पवृत्ति यथार्थ ज्ञान नहीं है क्योंकि यहाँ वृत्ति से ज्ञात वस्तु का सर्वथा अभाव होता है , जबकि प्रमाणवृत्ति में सर्वत्र विषय - वस्तु का सद्भाव रहता है।

अभिन्न वस्तुओं में भेद और भिन्न वस्तुओं में अभेद की कल्पना कर शब्दों का प्रयोग कर अभिव्यक्ति करना ही विकल्प वृत्ति का आधार है।

अभाव - प्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ 1/ 10 ॥ अभाव की प्रतीति का आलम्बन - आश्रय करनेवाली चित्तवृत्ति निद्रा , कही जाती है । इस वृत्ति में चित्त बराबर सक्रिय रहता है। ज्ञानेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं रहतीं। जैसे जाग्रत और स्वप्न अवस्था में ऐन्द्रिक ज्ञान होते रहते हैं ; ऐसा कोई ज्ञान सुषुप्ति अवस्था में नहीं होता । सुषुप्ति अथवा गहरी नींद की अवस्था में - जिसमें ज्ञान का अभाव मालुम पड़ता है , निद्रा वर्ग की चित्त - वृत्ति है। सुषुप्ति अवस्था का समाधि एवं मोक्ष अवस्था के समान दर्जा दिया गया है ; फिर भी इस वृत्ति का निरोध इस कारण आवश्यक है , कि यह तमोगुण प्रधान मानीजाती है ; जब कि , समाधि सत्त्वप्रधान है।

इस वृत्ति में चित्त बराबर सक्रिय रहता है। ज्ञानेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं रहतीं।

जैसे जाग्रत और स्वप्न अवस्था में ऐन्द्रिक ज्ञान होते रहते हैं ; ऐसा कोई ज्ञान सुषुप्ति अवस्था में नहीं होता ।

सुषुप्ति अथवा गहरी नींद की अवस्था में - जिसमें ज्ञान का अभाव मालुम पड़ता है , निद्रा वर्ग की चित्त - वृत्ति है।

सुषुप्ति अवस्था का समाधि एवं मोक्ष अवस्था के समान दर्जा दिया गया है ; फिर भी इस वृत्ति का निरोध इस कारण आवश्यक है , कि यह तमोगुण प्रधान मानीजाती है ; जब कि , समाधि सत्त्वप्रधान है।

अनुभूतविषय असम्प्रमोषः स्मृतिः ॥ 1/11 ॥ पहले अनुभव किये हुए विषय का फिर उभर आना , स्मृति नामक चित्तवृत्ति है । व्यक्ति के द्वारा अनुभूत विषय , जो उसके ज्ञान के रूपमें पूर्णतया उस व्यक्ति के अधिकार में रहता है , असम्प्रोष कहलाता है। विषय की अनुभूति के समान संस्कार होते हैं। अनुभूति के बाद अनुभवजन्य संस्कार चित्त में बस जाते हैं। संस्कारों के सदृश स्मृति हुआ करती है। स्मृति का विषय सदा वही होता है , जो अनुभव का विषय रहा हो। कालान्त र में , अनुकूल निमित्त उपस्थित होने पर , अनुभूत संस्कार उभर आते हैं , जो उस विषय को याद करा देते हैं। यह स्मृतिवृत्ति है। बिना अनुभव किये हुए विषय का स्मरण नहीं होता। किंतु , कभी - कभी , संस्कार के न रहने से , अनुभव किये हुए विषय का भी स्मरण नहीं हो पाता।

व्यक्ति के द्वारा अनुभूत विषय , जो उसके ज्ञान के रूपमें पूर्णतया उस व्यक्ति के अधिकार में रहता है , असम्प्रोष कहलाता है।

विषय की अनुभूति के समान संस्कार होते हैं। अनुभूति के बाद अनुभवजन्य संस्कार चित्त में बस जाते हैं।

संस्कारों के सदृश स्मृति हु

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